Sunday, 5 November 2017

11. सर्दी के मौसम में बच्चों को सर्दी खासी होने का डर रहता है ।

बच्चो को इंफेक्‍शन का डर

बच्चे सबसे ज्यादा इंफेक्शन की चपेट में आते हैं, खासकर सर्दी और खासी बच्चों में होने वाला एक आम समस्या है। हालाँकि, नवजात शिशु में इस तरह की समस्या कई कारणों से हो सकती है, जैसे कि माँ को यदि जुकाम हुआ हो तो बच्चे का होना लाज़िमी है। क्योंकि, बच्चे अपने माँ के दूध से ही यह इंफेक्शन अपने अंदर लेते हैं। या फिर जुकाम से पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आने से भी बच्चे इंफेक्शन की चपेट में आ जाते हैं।

हालाँकि, आप अपने छोटे बच्चे में कुछ घरेलू उपचार के जरिए इसे कम कर सकती हैं, ताकि उन्हें साँस लेने में आसानी हो सके, जो निम्न हैं-

तरल पदार्थ

अपने बच्चे को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ पीने के लिए दें क्योंकि इससे डिहाइड्रेशन से बचा जा सकता है। अक्सर, जुकाम के समय शरीर में पानी की कमी हो जाती है। साथ ही यह बच्चे की नाक में जमे श्लेम को भी बाहर निकालता है और उसे पतला करता है। लेकिन, इस बात का जरूर ध्यान रखें कि यदि आपका बच्चा 6 महीने का है तो उसे तरल पदार्थ न दें।

गुनगुने तेल की मालिश

अपने बच्चे को गुनगुने सरसो के तेल से मालिश करें, इससे न केवल बच्चे को आराम मिलेगा बल्कि जुकाम से भी राहत मिलेगी। यदि आप चाहें तो इसमें एक जायफल डाल सकती हैं, क्योंकि जायफल गर्म होता है, और बच्चे के मालिश के लिए फायदेमंद माना जाता है।

शहद

अपने बच्चे को शहद चटाएं, क्योंकि यह गले को तर करता है और राहत पहुंचाता है। साथ यह खांसी को काबू करने में भी मददगार होता है। लेकिन, इस बात का भी ध्यान रखें कि आप एक साल से कम उम्र के बच्चे को शहद न दें।

गुनगुने पानी से स्नान

अपने बच्चे को गुनगुने पानी से नहलाएं, लेकिन याद रखें कि बच्चे को नहलाते समय कमरे बंद हों। साथ ही उसे तुरंत सूखे तौलिए में लपेटे, ताकि बाहर की सर्द हवा न लग पाए।

सिर को ऊंचा करके लिटाना

सिर ऊंचा करके सुलाने से शिशु को सांस लेने में ज्यादा आसानी रहती है। आप शिशु के गद्दे के नीचे तौलिये या तकिये लगाकर सिराहना ऊँचा कर सकती हैं।

जब परेशान हो सर्दी से

सर्दी-खासी बच्चे की आम बीमारी है। यदि आप सर्दी-खासी होने पर लापरवाही बरतते हैं तो आगे चलकर यह बीमारी भयावह रूप ले लेती है। जानते हैं इस बीमारी के लक्षण व उपचार -

सर्दी-जुकाम :
सर्दी-जुकाम के जाने-पहचाने लक्षण गले में खराश और बहती नाक एक ऐसे वायरस के कारण पैदा होते हैं, जिस पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं पड़ता, इसलिए जब तक स्वयं शरीर का प्रतिरक्षा-तंत्र (डिपेंस मैकेनिज्म) उस वायरस का मुकाबला करने के योग्य नहीं बन जाता, तब तक दवाएँ उसका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं।

ऐसे में क्या करें? :
छोटे शिशुओं को सर्दी-जुकाम से ज्यादा परेशानी वास्तव में नाक बन्द होने से होती है, क्योंकि ऐसे में दूध पीते समय या सोते समय सांस लेना मुश्किल हो जाता है, इसलिए अपने डॉक्टर से शिशु की बंद नाक को खुलवाने का तरीका जान लें, ताकि आपका शिशु कम से कम आसानी से सांस तो ले सके।इसके अलावा, वह माँ जो अपने बच्चे को स्तनपान कराती हैं, वह अपने खान-पान का ख्याल रखें। क्योंकि, बच्चे अपने माँ के दूध से सारी चीजें अपनी अंदर खीचतें हैं। ऐसे में, माँ को ज्यादा ठंडी चीजों को खाने से बचना चाहिए, जैसे कि दही, अमरूद, आइसक्रीम जैसी चीजों को।

Thursday, 2 November 2017

10. बच्चों को सर्दी खासी और जुकाम से बचने के उपाय


 बच्चों की सर्दी-खांसी जड़ से ख़त्म करेंगें ये घरेलू उपाय


प्रत्येक वर्ष सैकड़ों नवजात एवं छोटे बच्चे, विशेषतः कमजोर प्रतिरक्षा-तन्त्र की कमजोरी के कारण, सर्दी-खांसी का शिकार होते हैं । वस्तुतः अधिकतर शिशु, अपने जीवन के प्रथम वर्ष में ही लगभग सात-बार इस समस्या से दो-चार होते हैं

बच्चे संक्रमित वायु, सतह या किसी संक्रमित व्यक्ति की समीपता के कारण, विभिन्न प्रकार के संक्रमण फैलाने वाले रोगाणुओं के संपर्क में आ जाते हैं। बीमार बच्चे की देखरेख, माँ-बाप एवं उनकी देखभाल करने वालों के लिए समान रूप से मुश्किल हो सकती है ।

अमेरिकन बाल-रोग अकादमी, छः वर्ष से कम आयु के बच्चों को सर्दी-खांसी की दवाईयां ना देने की सलाह देती है । क्योंकि, इन दवाईयों से घातक दुष्परिणामों की सम्भावना होती है । इन विपरीत परिस्तिथियों में प्राकृतिक तरीकों से ही उपचार करना श्रेष्ठ है । घरेलू उपचार बच्चों की सर्दी-खांसी में राहत पहुंचा कर उनके प्रतिरक्षा-तंत्र को शक्तिशाली बनाते हैं ।

फिर भी, अगर आपका शिशु तीन-माह से कम आयु का है और ज्वर से ग्रसित है तो सदैव अपने चिकित्सक से परामर्श लें। बच्चों की सर्दी-खांसी में कारगर नौ शीर्ष उपचार:


छोटे बच्चों का बुखार कम करने एवं शरीर के तापमान को विनियमित करने हेतु,
उन्हें दिन में दो से तीन बार ठन्डे पानी से अथवा स्पंज-स्नान करवाएं ।
स्पंज को कमरे के तापमान के बराबर-तापमान वाले पानी में भिगोकर उसका अतिरिक्त पानी निचोड़ लें ।
और फिर बच्चे के तापमान को कम करने के लिए उसके हाथ-पैर, कांख एवं उसके कमर से नीचे के हिस्से को पोंछे ।
 एक अन्य विकल्प के तहत आप बच्चे के माथे पर गीली पट्टियां भी रख सकते हैं । गीली पट्टियों को कुछ-एक मिनटों के अंतराल पर बदलते रहें ।

नोट: अत्यधिक ठन्डे पानी का इस्तेमाल ना करें यह शरीर के आंतरिक तापमान में बढ़ोतरी कर सकता है ।


एक कढाई में चार-नींबू का रस, उनके छिलके और एक चम्मच अदरक की फांके लें । इसमें पानी डालें ताकि सारे के सारे अवयव इसमें डूब जाएँ। इसे ढक कर 10 मिनट तक काढें । इस प्रकार तैयार पानी को अलग कर लें। अब इस तरल पेय में उतनी ही मात्र में गर्म-पानी तथा स्वाद के लिए शहद मिलाएं। बच्चे को इस प्रकार तैयार गर्म नींबू-पानी दिन में कुछ-बार पीने को दें।

नोट: एक-वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए चीनी के स्थान पर शहद मिलाएं ।


एक-वर्ष या फिर उससे कम आयु के बच्चों के लिए, जोकि सर्दी-खांसी से पीड़ित हों, शहद एक सुरक्षित उपचार है । दो चम्मच कच्चा शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिला लें । हर, कुछ एक घंटों के अंतराल के बाद राहत दिलाने के लिए पिलायें । एक गिलास गर्म-दूध, शहद मिलाकर पीने से सूखी खांसी एवं सीने के दर्द में राहत मिलती है ।

एक वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए गर्म चिकन का सूप भी एक अच्छा विकल्प है । यह हल्का एवं पोषक होता है, तथा छाती जमने और नाक बंद होने से छुटकारा दिलाता है । इसमें उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट ठीक होने की प्रक्रिया को अधिक तेज कर देते हैं । आप बच्चों को दिन में दो से तीन बार यह सूप दे सकते हैं ।


संतरे में मौजूद विटामिन-सी श्वेत रक्त कोशिकाओं का निर्माण बढाने में सहायक है । यही कोशिकाएं सर्दी-जुकाम के रोगाणुओं से लडती है । संतरा प्रतिरक्षा-तंत्र को दृढ़ता प्रदान करके खासी, गले की दर्द और नाक बहने की समस्या में राहत पहुंचाता है। दो वर्ष से कम उम्र के बच्चे को प्रतिदिन एक से दो गिलास संतरे का रस पिलायें। इससे कम आयु के बच्चों को बराबर मात्रा में पानी मिलाकर नियमित अंतराल के बाद पिलायें। बड़े बच्चों को, विटामिन-सी की ख़ुराक अधिक करने के लिए, संतरे खाने को दिए जा सकते हैं।


छः कप पानी में, आधा कप बारीक कटे हुए अदरक की फांके और दालचीनी के दो छोटे टुकड़ों को 20 मिनट तक धीमी आंच पर पकायें । फिर इसे छानकर चीनी या शहद मिलाकर दिन में कई बार बच्चे को पीने के लिए दें । एक वर्ष से कम आयु के बच्चों को बराबर मात्रा में गर्म-पानी मिलाकर पिलायें

एक हिस्सा कच्चा, बिना छाना हुआ सेब का सिरका और दो हिस्से ठंडा पानी मिलाकर उसमें दो पट्टियां भिगोयें । फिर उन्हें निचोड़कर एक को माथे पर और एक को पेट पर रखें । दस- दस मिनट के बाद पट्टियां बदलते रहें । प्रक्रिया को बुखार कम होने तक दोहरायें ।


स्तनपान बच्चों के लिए अति महत्वपूर्ण है, खासकर जब वे बीमार हों । यह उन्हें अदभुत संतुलित पोषक-तत्वों की श्रृंखला प्रदान करता है । जोकि उन्हें संक्रमण से लड़ने और शीघ्र स्वस्थ होने में सहायता करते हैं । छः माह से कम आयु के शिशुओं को, सर्दी-खांसी से निजात दिलवाने के लिए, स्तनपान कराना चाहिए ।


सुनिश्चित करें की आपके बच्चे को भरपूर तरल-पदार्थ मिलें । अन्यथा वह निर्जलीकरण का शिकार हो सकता है, जिससे समस्या अधिक गंभीर हो सकती है । शरीर में पानी का उचित स्तर, मल -निकास को पतला करके आपके बच्चे के शरीर से कीटाणुओं का निकास करने में और बंद-नाक,छाती जमने आदि की समस्या से बचाता है

 बच्चों को सर्दी  और जुकाम से बचाब

अपने शिशु को पहली बार सर्दी-जुकाम से परेशान होते हुए देखना आपके लिए भी तकलीफ भरा हो सकता है। शिशु को बेचैनी सी रहेगी और वह नाक सुड़कता रहेगा। उसे स्तनपान करने में भी मुश्किल हो सकती है। मगर, आप उसकी ये तकलीफ दूर करने के लिए काफी कुछ कर सकती हैं।

आप फिक्र न करें, इसे आमतौर पर साधारण सर्दी-जुकाम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह काफी आम है और सामान्यत: यह ज्यादा गंभीर बीमारी नहीं होती है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि आपके शिशु को पहले दो सालों में आठ से 10 बार सर्दी-जुकाम होगा। इसका मतलब है कि आपकी बहुत सी रातें जुकाम से परेशान शिशु की देखभाल में गुजरेंगी

सर्दी-जुकाम किस वजह से होता है?

सर्दी-जुकाम मुंह, नाक और गले का इनफेक्शन है, जो कि बहुत से अलग-अलग विषाणुओं में से किसी एक की वजह से होता है। शिशुओं को जुकाम ज्यादा इसलिए होता है, क्योंकि उनकी प्रतिरक्षण प्रणाली (इम्यून सिस्टम) अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती। वह अभी संक्रमणों से लड़ने की शक्ति विकसित कर रही होती है।

जब सर्दी-जुकाम से ग्रस्त कोई व्यक्ति छींकता या खांसता है, तो जुकाम के विषाणु हवा में फैल जाते हैं और किसी अन्य व्यक्ति में सांस के जरिये अंदर पहुंच जाते हैं। इसी तरीके से जुकाम एक से दूसरे व्यक्ति तक फैलता है। ये विषाणु हाथ से हाथ के संपर्क से भी फैलते हैं। इसलिए नाक छिनकने के बाद हमेशा अपने हाथ धोएं।

जुकाम शिशु को किस तरह प्रभावित करता है?

अगर आपके शिशु को जुकाम है, तो आपको निम्नांकित लक्षणों में से कुछ दिखाई दे सकते हैं:
101 डिग्री फेरनहाइट तक बुखारखांसीआंखे लाल हो जानागले में खराशकान में दर्दश्लेम (म्यूकस) से भरी और बहती नाकचिड़चिड़ापन और बेचैनीभूख न लगनालसीका पर्व (लिम्फ नोड्स) में सूजन (बगल में, गर्दन पर और सिर के पीछे)
अगर, शिशु की नाक में श्लेम भरा हो, तो उसे नाक से सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। ऐसे में शायद उसे स्तनपान करवाना भी मुश्किल हो। आमतौर पर बच्चे करीब चार साल की उम्र से पहले अपनी नाक छिनकना नहीं जान पाते, इसलिए आपको नाक से श्लेम निकालने में शिशु की मदद करनी होगी।

हो सकता है आपका शिशु अब बिना जगे पूरी रात सोने लग गया हो। ऐसे में जुकाम के दिनों में बेचैनी के कारण उसका रात में बार-बार उठना, आपको उसके जन्म के पहले कुछ हफ्तों की याद ताजा करा देगा!

सर्दी-जुकाम से बेचैनी और सांस लेने में तकलीफ की वजह से रात में वह शायद बहुत बार उठेगा। तैयार रहें, आपको भी रात को शिशु को आराम दिलाने और उसकी नाक पौंछने के लिए जागना होगा।

सामान्यत: सर्दी-जुकाम कितने समय तक रहता है?

जुकाम के लक्षण आमतौर पर तीन से 10 दिनों बाद कम होने लगते हैं, हालांकि बहुत छोटे शिशुओं में ये दो हफ्ते तक जारी रह सकते हैं। जो शिशु, बड़े बच्चों के संपर्क में ज्यादा रहते हैं, उन्हें अपने पहले साल में करीब छह से 10 बार जुकाम होता है। हो सकता है आपको उनकी नाक सर्दी के मौसम में हर समय बहती ही नजर आए।

अगर आपका बच्चा डेकेयर सेंटर या प्ले स्कूल जाता है, तो उसे एक साल में 12 बार भी सर्दी-जुकाम लग सकता है!

क्या मैं शिशु को सर्दी-जुकाम होने से बचा सकती हूं?

शिशु को स्तनपान करवाना उसके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के बेहतरीन उपायों में से एक है। इससे शिशु को आपके रोग-प्रतिकारक (एंटीबॉडीज, संक्रमण से लड़ने के लिए आपके शरीर में मौजूद रसायन) मिलते हैं। शिशु की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यह पक्का उपाय नहीं है, मगर स्तनपान करने वाले शिशु सर्दी-जुकाम और अन्य इनफेक्शन से बेहतर बचाव कर पाते हैं।

शिशु का संक्रमणों से बचाने के लिए बेहतर तो यही है कि उसे बीमार व्यक्ति से दूर रखा जाए। या फिर आप उन्हें शिशु को पकड़ने या उसकी चीजों को छूने से पहले हाथ धोने के लिए कहें।

अगर आप या आपके पति धूम्रपान करते हैं, तो इसे बंद कर देना शिशु के लिए अच्छा रहेगा। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने वाले शिशुओं को ज्यादा जुकाम होता है और यह काफी लंबा चलता है। वहीं धूम्रपान के धुएं से दूर रहने वाले शिशुओं को धुएं के संपर्क में रहने वाले शिशुओं की तुलना में कम जुकाम होता है। शिशु को ऐसी जगहों पर भी ले जाने से भी बचें, जहां कोई धूम्रपान कर रहा हो।

शिशु को सर्दी-जुकाम होने पर डॉक्टर से कब बात करनी चाहिए?

अगर आपके शिशु की उम्र तीन महीने से कम है, तो बीमारी के पहले लक्षण दिखाई देने पर ही उसे डॉक्टर के पास ले जाएं, जैसे कि:
उसका जुकाम तीन दिन से ज्यादा रहेउसका बुखार 100.4 डिग्री फेरनहाइट से ज्यादा हो जाएउसे सांस लेने में परेशानी हो रही होउसकी खांसी ठीक न हो रही होवह अपने कान खुजाता रहता है और चिड़चिड़ा हो गया है - यह कान में संक्रमण का संकेत हो सकता हैउसके खांसने पर हरा, पीला या भूरा श्लेम निकल रहा है या फिर उसकी नाक से श्लेम निकल रहा है
सर्दी-जुकाम का यदि उचित इलाज न कराया जाए, तो इससे गंभीर जीवाण्विक (बैक्टिरियल) इनफेक्शन जैसे कि निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, फ्लू या कान का संक्रमण हो सकता है।

मैं सर्दी-जुकाम का उपचार कैसे कर सकती हूं?

शिशु का जुकाम अपने आप ठीक हो जाएगा। मगर, आप उसकी परेशानी को कम करने के लिए कुछ कदम उठा सकती हैं, जैसे कि:
सुनिश्चित करें कि आपके शिशु को पर्याप्त आराम मिले।

शिशु को ज्यादा बार स्तनपान या बोतल से दूध पीने के लिए प्रोत्साहित करें। अगर आपका शिशु फॉर्मूला दूध पीता है या ठोस आहार ले रहा है, तो आप उसे पानी भी दे सकती हैं। आप विटामिन सी से भरपूर फलों के रस भी ज्यादा मात्रा में दे सकती हैं। ये सब उसे जलनियोजित रखेंगे और यदि बुखार हो, तो उसे भी कम करते हैं।

अगर शिशु को बुखार हो, तो आप डॉक्टर के निर्देश पर उसे पैरासिटामोल सस्पेंशन भी दे सकती हैं। मगर, यह उसे तीन महीने का या इससे बड़ा हो जाने पर ही दे सकती हैं। शिशु को कोई भी दवा देने से पहले डॉक्टर से अवश्य पूछ लें। सर्दी-जुकाम का कोई भी घरेलू उपचार डॉक्टर से बिना पूछे न करें। डॉक्टरी पर्ची के बिना मिलने वाली सर्दी-जुकाम की दवाएं एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। हालांकि जुकाम से राहत के लिए दवाइयां भी गैर औषधीय सिरप से कुछ ज्यादा असरदार नहीं पाई जातीं हैं।

अगर, आपके शिशु की नाक बंद हो, तो गद्दे के सिराहने पर नीचे एक-दो पुराने तौलिये लगाकर उसे थोड़ा ऊंचा उठा दें। तकियों से दम घुटने का खतरा हो सकता है, इसलिए शिशु का सिर ऊंचा करने के लिए तकियों का इस्तेमाल न करें।

आपका शिशु अभी अपनी नाक नहीं छिनक सकता। इसलिए आप उसकी नाक पौंछती रहें, ताकि उसे सांस लेने में आसानी हो। आप शिशु के नथुनों के बाहर थोड़ी सी पैट्रोलियम जैली भी लगा सकती है, ताकि त्वचा की संवेदनशीलता कम हो सके।

अगर शिशु को नाक में श्लेम भरा होने की वजह से स्तनपान करने में मुश्किल हो रही हो, तो आप उसके डॉक्टर से नाक में डालने वाली लवणयुक्त ड्रॉप्स (सैलाइन ड्रॉप्स) के बारे में पूछ सकती हैं। आप घर पर भी लवणयुक्त पानी तैयार कर सकती हैं। उबालकर ठंडे किए गए 30 मि.ली. पानी में चुटकी भर नमक मिलाने पर यह पानी तैयार हो जाता है। इस पानी के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं और इसे दिन में कई बार आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ माता-पिता शिशु की नाक में नमक का पानी डालने के बाद सक्शन बल्ब के इस्तेमाल से श्लेम बाहर निकाल लेते हैं।

भाप से भी शिशु की नाक में भरे श्लेम को ढीला करने में मदद मिल सकती है। मगर, शिशु को गर्म, भाप वाले पानी के ज्यादा नजदीक न लाएं, इससे उसके जलने का खतरा रहता है। भाप दिलवाने का एक सुरक्षित तरीका यह है कि उसे अपने साथ बाथरूम में ले जाएं। गर्म पानी का शावर चालू करें, दरवाजे को बंद कर लें और भापयुक्त बाथरूम में कुछ मिनटों तक बैठे रहें। इस तरीके से भाप दिलवाने के बाद शिशु के कपड़े अवश्य बदल दें।

वेपर रब लगाने से भी शिशु को सांस लेने में आसानी हो सकती है। इसे शिशु की छाती और पीठ पर लगाएं। शिशु के नथुनों पर इसे न लगाएं, क्योंकि इससे सांस लेने में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
अगर, आपके शिशु की केवल नाक बंद हो, और बाकी अन्य कोई लक्षण न हों, तो देख लें कि कहीं शिशु के नथुनों में कुछ और चीज तो नहीं फंस गई है। छोटे शिशु भी अपनी नाक में कुछ डालने में माहिर हो सकते हैं।।

सर्दी-जुकाम जीवन की सच्चाई है। शिशु की पहली जुकाम को देख लेने के बाद, आप शिशु की अगली जुकाम के लिए तैयार हो जाएंगी। आपको पता होगा कि जुकाम होने पर क्या हो सकता है।



Wednesday, 1 November 2017

9. बच्चो की नार्मल डिलेवरी कैसे होती है?

बच्चो की नार्मल डिलेवरी

क्योंकि मनुष्य एक द्विपाद और सीधी मुद्रा वाला प्राणी है, और श्रोणी के आकार के हिसाब से, स्तनधारी प्राणियों में मनुष्य का सर सबसे बड़ा होता है, महिलाओं के श्रोणी और मनुष्य के भ्रूण को इस तरह से बनाया गया है की जन्म संभव हो सके.

महिला की सीधी मुद्रा उसके पेट के अंगों का वजन उसके श्रोणी के तल पर डालती है, जो की एक बड़ी जटिल संरचना होती है और जिसे ना सिर्फ वजन सहना होता है बल्कि तीन वाहिकाओं को भी अपने अन्दर से बाहर जाने का रास्ता देना होता है: मूत्रमार्ग, योनि और मलाशय.अपेक्षाकृत बड़े सिर और कन्धों को श्रोणी की हड्डी से निकलने के लिए गतिशीलता का एक विशेष अनुक्रम अपनाना पड़ता है। इस गतिशीलता में किसी भी तरह की विफलता होने पर अधिक लम्बी और दर्दनाक प्रसव पीड़ा होती है और यहाँ तक की इस वजह से प्रसव रुक तक सकता है। गर्भाशय ग्रीवा के कोमल उतकों और जन्म नलिका में सभी परिवर्तन इन छह चरणों के सफल समापन पर निर्भर करते हैं:

भ्रूण के सिर का अनुप्रस्थ स्थिति में आ कर लगना. बच्चे का सिर श्रोणि के आर पार मुंह करता हुआ माता के कूल्हों पर लगा होता है।भ्रूण के सिर का उतरना और उसका आकुंचन होना.आंतरिक घूर्णन. भ्रूण का सिर ओकीपिटो हड्डी के आगे के हिस्से में 90 डिग्री पर घूमता है ताकि बच्चे का चेहरा माता के मलाशय की ओर हो.विस्तार के द्वारा डिलिवरी. भ्रूण का सिर जन्म नलिका के बाहर आता है। इसका सिर पीछे की ओर झुका होता है ताकि उसका माथा योनि के माध्यम से बाहर का रास्ता बनाता है।प्रत्यास्थापन. भ्रूण का सिर 45 डिग्री के कोण पर घूमता है ताकि यह कन्धों के साथ सामान्य स्थिति में आ जाए, जो अभी तक एक कोण पर टिके होते हैं।बाहरी घूर्णन. कंधे सिर की सर्पिल गति की आवृत्ति करते हैं, जो भ्रूण के सिर की अंतिम चाल में दिखता है।

जैसे जैसे भ्रूण का सिर जन्म नलिका से बाहर निकलता है, वह अस्थायी रूप से अपना आकार बदलता है (अधिक लंबा हो जाता है).भ्रूण के सिर के आकार के इस परिवर्तन को मोल्डिंग कहा जाता है और यह उन महिलाओं में साफ़ तौर पर दिखता है जिनकी पहली बार योनिमार्ग द्वारा प्रसूती हो रही होती है।

सुप्त चरण ÷ 

प्रसव का सुप्त चरण, जिसे प्रोडरमल लेबर भी कहते हैं, कई दिनों तक चल सकता है और इस चरण में जो संकुचन होते है वे ब्रेक्सटन हिक्स संकुचन जो कि गर्भावस्था के 26वें सप्ताह से प्रारम्भ होते हैं से अधिक गहन होते हैं। ग्रीवा विलोपन गर्भावस्था के अंतिम सप्ताहों के दौरान होता है और आमतौर पर सुप्त चरण के पूरा होने तक या तो समाप्त हो चुका होता है या समाप्त होने वाला होता है। ग्रीवा विलोपन या गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव से आशय है गर्भाशय ग्रीवा का पतला होना या फैलना.योनि परीक्षा के दौरान ग्रीवा विलोपन किस हद तक हुआ है यह महसूस किया जा सकता है। एक 'लंबी' गर्भाशय ग्रीवा का तात्पर्य है कि नीचे वाले हिस्से में बच्चा नहीं जा पाया है और छोटी ग्रीवा होने का अर्थ इसके विपरीत होता है। सुप्त चरण का अंत सक्रिय चरण की शुरुआत से होता है, जब गर्भाशय ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है।

पहला चरण: फैलाव

प्रसव पीड़ा सहती हुई माता की प्रगति का आकलन करने के लिए कई कारक होते हैं जिनका उपयोग दाइयां और चिकित्सक करते हैं और इन कारको को हम बिशप स्कोर से परिभाषित करते हैं। बिशप स्कोर का प्रयोग यह भविष्यवाणी करने के लिए भी किया जाता है की माता स्वयं ही स्वाभाविक रूप से दूसरे चरण (प्रसूती) में प्रवेश कर पाएगी या नहीं.

प्रसव का पहला चरण तब शुरू होता है जब विलोपित ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है। इस स्थिति में कुछ विभिन्नता हो सकती है क्योंकी इस स्थिति में पहुँचने से पहले भी कुछ महिलाओं में सक्रिय संकुचन की शुरुआत हो जाती है। वास्तविक प्रसव की शुरुआत तब मानते हैं जब गर्भाशय ग्रीवा धीरे धीरे फैलने लगती है। झिल्ली का टूटना, या रक्त के धब्बे का दिखना जिसे 'शो' कहते हैं वह इस चरण में अथवा इसके आसपास घटित हो भी सकता है और नहीं भी.

गर्भाशय की मांसपेशियां गर्भाशय के उपरी क्षेत्र से उस स्थान तक जहां पर गर्भाशय का निचला क्षेत्र जुड़ता है सर्पिल गति में घूमती है। विलोपन के दौरान, गर्भाशय ग्रीवा गर्भाशय के निचले हिस्से में शामिल हो जाती है। एक संकुचन के दौरान, ये मांसपेशियां सिकुडती हैं और बच्चे को निष्कासित करने के उद्देश्य से जो गतिविधि होती है उससे ऊपरी हिस्सा छोटा हो जाता है और निचला हिस्सा ऊपर को आता है। इससे ग्रीवा खिंच कर बच्चे के सर के ऊपर आ जाती है। पूरा फैलाव तब माना जाता है जब ग्रीवा का मुंह इतना चौड़ा हो जाता है की वह एक पूर्ण विकसित बच्चे का सर बाहर निकाल सके, जो की तकरीबन 10 सेमी होता है।

प्रसव काल की अवधि में अलग अलग महिलाओं में काफी अंतर पाया जाता है, परन्तु उन महिलाओं में जो पहली बार बच्चे को जन्म दे रही होती हैं, सक्रिय चरण औसतन आठ घंटे का होता है और चार घंटे का उन महिलाओं में होता है जो पहले भी जन्म दे चुकी होती हैं। पहली बार बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं में सक्रिय चरण का रुकना तब माना जाता है जब उनकी गर्भाशय ग्रीवा कम से कम दो घंटे में भी 1.2 सेमी प्रति घंटे की दर से भी नहीं फैलती है। यह परिभाषा फ्रीडमैन कर्व पर आधारित है, जो की सक्रिय प्रसव के दौरान ग्रीवा के फैलाव की आदर्श दर और भ्रूण के बाहर निकलने को ग्राफ की सहायता से मापती है।कुछ चिकित्सक "प्रसव की प्रगति में विफलता" बता कर, अनावश्यक रूप से सिजेरियन ऑपरेशन करते हैं। हालांकि, जैसा की किसी भी प्रथम रोग निदान के साथ होता है, ऐसा करने को गंभीर रूप से हतोत्साहित किया जाता है क्योंकी इसमें अतिरिक्त खर्चा होता है और घाव ठीक होने में काफी समय लगता है।


दूसरा चरण: भ्रूण निष्कासन

इस चरण का प्रारम्भ तब होता है जब गर्भाशय ग्रीवा पूरी तरह फैल जाती है और तब समाप्त होता है जब अंततः बच्चे का जन्म हो जाता है। जैसे जैसे गर्भाशय ग्रीवा पर दबाव बढ़ता है, फर्ग्यूसन रिफ्लेक्सगर्भाशय के संकुचन बढ़ा देता है ताकि दूसरा चरण आगे बढ़ सके.सामान्य दूसरे चरण की शुरुआत में, सिर पूरी तरह से श्रोणि में लग जाता है; और सिर का सबसे चौड़ा व्यास श्रोणि के किनारे से निकल चुका होता है।

आदर्श रूप में इसे सफलतापूर्वक (interspinous) इंटरस्पाइनस व्यास के नीचे आ जाना चाहिए.यह श्रोणि का सबसे संकरा हिस्सा होता है। यदि ये गतिविधियाँ पूरी हो जाती हैं तो, भ्रूण के सिर का श्रोणि चाप से बाहर निकलना और योनि के द्वार से बाहर निकलना रह जाता है। इस कार्य में माता के "नीचे धकेलने के प्रयास" या धक्का देने का प्रयास भी सहायता करते हैं। लेबिया के अलग होने पर भ्रूण का सिर दिखने लग जाता है जिसे "क्राउन" कहते हैं। इस बिंदु पर औरत को जलने का या चुभने का एहसास हो सकता है।

भ्रूण के सिर का जन्म प्रसव की चौथी प्रक्रिया के सफलतापूर्वक समाप्त होने का संकेत होता है (विस्तार द्वारा प्रसव और इसके बाद पांचवी और छठी प्रक्रिया (प्रत्यास्थापन और बाहरी घूर्णन) अपना स्थान लेती हैं।
नाभि रज्जु के साथ एक नवजात शिशु जिसकी नाभि रज्जु को अब बाँधना है।

प्रसव के दूसरे चरण में कुछ हद तक विभिन्नता हो सकती है और यह इस पर निर्भर करता है की पिछले कार्य कितनी सफलता से पूरे हुए हैं।

तीसरा चरण: नाभि रज्जु का बंद होना और गर्भनाल का निष्कासन

प्रसव के तीसरे चरण के दौरान और उसके बाद स्तनपान, नाभि रज्जु योनी में से दिखने लग जाती है।

भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से ले कर नाभि रज्जु के निकलने तक का काल प्रसव का तीसरा चरण कहलाता है।

इस अवस्था में नाभि रज्जु को बांधा जाता है और काटा जाता है, परन्तु अगर इसे बांधा ना भी जाए तो भी यह स्वाभाविक रूप से बंद हो जाती है। 2008 में हुई एक कोचरेन समीक्षा ने नाभि रज्जु को बाँधने के समय को देखा. यह पाया गया कि नाभि रज्जु को बाँधने के समय से माता की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु बच्चे की स्थिति में फर्क पड़ता है। यदि नाभि रज्जु को जन्म के 2-3 मिनट के बाद बांधा जाता है, तो शिशु को अपने जीवन के पहले महीने में हीमोग्लोबिन की बढ़ी हुई मात्रा मिलती है, परन्तु साथ ही बच्चे को पीलिया के कारण फोटोथेरेपी देने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। कभी कभी एक नवजात शिशु का जिगर माता के गर्भ में प्राप्त हुई सभी लाल कणिकाओं को तोड़ नहीं पाता, विशेषकर तब जब नाभि रज्जु बाँधने में देरी के कारण शिशु को अधिक मात्रा में रक्त मिल जाता है और ऐसी स्थिति में फोटोथेरेपी रक्त कणिकाओं को तोड़ने में सहायता करती है।

नाभि रज्जु का निष्कासन गर्भाशय की दीवार से शारीरिक रूप से टूट कर होता है। भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से नाभि रज्जु के निकलने तक के काल को प्रसव का तीसरा चरण कहते हैं। सामान्यतः बच्चे के जन्म के 15-30 मिनट के भीतर नाभि रज्जु बाहर निकाल दी जाती है। नाभि रज्जु निष्कासन को सक्रिय रूप से सम्भाला जा सकता है, उदाहरण के लिए इंट्रामसकुलर इंजेक्शन द्वारा ऑक्सीटोसिनदे कर नाभि रज्जु हाथ से खींच कर निकाल ली जाती है ताकि नाभि रज्जु के बाहर आने में सहायता की जा सके. इसके अतिरिक्त वैकल्पिक रूप से, यह थोडा इंतज़ार कर के भी निकाली जा सकती है, जिसमें नाभि रज्जु को बगैर किसी चिकित्सकीय सहायता के स्वतः ही बाहर आने दिया जाता है। एक कोचरेन डेटाबेस  अध्ययन के अनुसार खून का बहना और प्रसव पश्चात खून बहने के खतरे को उन महिलाओं में घटाया जा सकता है जिनके प्रसव के तीसरे चरण के लिए सक्रीय प्रबंधन क़ी व्यवस्था के गई होती है।


जब प्रसव के दौरान अथवा धक्का देने के दौरान अम्निओटिक थैली नहीं फटती है, तो बच्चा साबुत झिल्ली के साथ भी पैदा हो सकता है। इस तरह से जन्म लेने क़ी घटना को "कॉल (शीर्षावरण) में जन्म लेना" कहते हैं। कॉल हानिरहित होता है और उसकी झिल्ली आसानी से टूट जाती है और साफ़ क़ी जा सकती है। आधुनिक सुधारात्मक (interventive) प्रसूति विज्ञान के आगमन के साथ, कृत्रिम रूप से झिल्ली को तोड़ना आम हो गया है, अतः बच्चे शायद ही कभी कॉल में पैदा होते हैं।

चौथा चरण

"प्रसव का चौथा चरण" एक ऐसा शब्द है जो दो अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है:

इसका तात्पर्य प्रसव के तुरंत बाद से हो सकता है, अथवा नाभि रज्जु के निकल आने के तुरंत बाद वाले घंटों से भी हो सकता है।प्रसव के बाद के हफ़्तों के लिए भी लाक्षणिक रूप से इसका प्रयोग हो सकता है।

बच्चे के जन्म के बाद

कई संस्कृतियों में बच्चों के जीवन क़ी शुरुआत के साथ रिवाज जुड़े हुए हैं, जैसे नामकरण संस्कार, दीक्षा संस्कार और अन्य.

माताओं को अक्सर एक अवधि ऐसी मिलती है जब वे अपने सामान्य काम से मुक्त होकर बच्चे के जन्म के बाद स्वास्थ्यलाभ अर्जित करती हैं। यह अवधि भिन्न भिन्न हो सकती है। कई देशों में, नवजात शिशु क़ी देखभाल के लिए काम से छुट्टी लेने को "मातृत्व अवकाश" या "पैरंटल अवकाश" कहा जाता है और यह अलग अलग जगहों पर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों के बीच हो सकता है।

अन्तिम चरण

स्टेशन से तात्पर्य है भ्रूण के बाहर निकलने वाले भाग का इशीअल स्पाइन से सम्बन्ध. जब बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग इशीअल स्पाइन पर होता है तब स्टेशन शून्य माना जाता है। अगर बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग स्पाइन के ऊपर होता है, तब इस दूरी को माइनस स्टेशंस में मापा और बताया जाता है, जो -1 से -4 सेमी के बीच हो सकता है। अगर पेश भाग इशीअल स्पाइन से नीचे होता है, तब इस दूरी को प्लस स्टेशन में बताते हैं (+1 से +4 सेमी). +3 और +4 पर बच्चे का पेश भाग मूलाधार पर होता है और देखा जा सकता है।
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Monday, 30 October 2017

8. बच्चों की जादुई मालिश






*बच्चों की जादुई मालिश कैसे करे ?
जब घर में नन्हे-मुन्ने की किलकारियाँ गुँजती हैं तो मन में प्रसन्नता का अहसास होता है। लेकिन जब वह लगातार रोता है तो कई बार माँ भी नहीं समझ पाती कि उसे क्या तकलीफ है।

नन्हें शिशु को संभालना कोई आसान बात नहीं है। खासकर तब जब वह एक या दो हफ्ते का हो। नन्हे शिशु की देखरेख करने में घर की बड़ी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

बच्चा जब लगातार रोता है तो घर की बड़ी-बूढ़ी महिलाएँ झट से भाँप जाती हैं कि उसके पेट में तकलीफ है या उसकी पसलियों में दर्द है।

मालिश से बच्चे के शरीर की थकी हुई माँसपेशियों को आराम मिलता है। मालिश बच्चों को कई तकलीफों जैसे पसलियों का दर्द, थकान आदि से फायदा पहुँचाती है। इससे रक्त संचार बढ़ता है और बच्चे के शरीर का विकास तेजी से होता है।

घर में अगर नानी-दादी हों तो वे बच्चों की हर रोज मालिश करने की सलाह देती हैं। इससे बच्चे का शरीर मजबूत बनता है लेकिन आजकल की महिलाएँ तो बच्चों के थोड़ा सा भी रोने पर घबरा जाती हैं व तरह-तरह की चिंताएँ करने लगती हैं।

कई महिलाएँ इस डर के मारे बच्चों की मालिश नहीं करती हैं कि उससे उनके बच्चे को कहीं कोई नुकसान न हो जाए।

मालिश से बच्चे को कोई नुकसान नहीं होता पर इसके लिए आवश्यक है कि मालिश सही तरीके से की जाए।

मालिश के साथ बच्चे की गेहूँ के आटे व तेल की लोई भी की जाती है। इससे उनके शरीर के अनचाहें बाल भी निकल जाते है तथा रक्तसंचार भी बढ़ता है।

* शुरुआत कब से करें?
सामान्यत: बच्चे के जन्म के पहले हफ्ते के बाद से ही मालिश आरंभ कर देनी चाहिए तथा 18 माह तक जारी रखनी चाहिए। सुबह एक बार बच्चे को नहलाने से पहले तथा शाम को उसके सोने से पहले मालिश करनी चाहिए।

मालिश का कोई विशेष मौसम नहीं होता है। यह हर मौसम में की जा सकती है। गर्मियों में दिन में दो बार तथा सर्दियों में तीन बार मालिश करना उचित रहता है।



* मालिश का सही तरीका
माँ अपने दोनों पैर फैलाकर बच्चे को पैरों के बीच में आरामदायक मुद्रा में ‍‍लिटाएँ। फिर हाँथों में तेल लेकर बच्चों के पैरों की तरफ से मालिश शुरू करते हुए छाती व हाथ ‍तक ले जानी चाहिए। उसके बाद बच्चे को पीठ के बल लिटाकर मालिश का यही तरीका आजमाएँ। अंत में बच्चे के चेहरे व सिर की मालिश करनी चाहिए।

* फायदेमंद है मालिश
  • मालिश से बच्चे के शरीर की थकी हुई माँसपेशियों को आराम मिलता है। मालिश बच्चों को कई तकलीफों जैसे पसलियों का दर्द, थकान आदि से फायदा पहुँचाती है। इससे रक्त संचार बढ़ता है और बच्चे के शरीर का विकास तेजी से होता है। मालिश से ‍शिशु की त्वचा में स्निग्धता व सुंदरता भी आती है 
  • मुझे शिशु की मालिश किस तरह करनी चाहिए?
  • शिशुओं को एक ही तरह के नियम और बार-बार उन्हें दोहराया जाना अच्छा लगता है। इसलिए अगर आप हर बार शिशु की एक ही तरीके से मालिश करेंगी, तो वह समझ जाएगा कि आगे क्या होने वाला है और वह मालिश का और अधिक आनंद लेगा।
  • शिशु की मालिश की शुरुआत उसके पैरों से करें और फिर शरीर से करते हुए सिर की मालिश से समाप्त करें। टांगों से शुरुआत करना सही रहता है, क्योंकि आपके शिशु को नैपी बदलने के दौरान टांगों को छुए जाने की आदत होती है।
  • क्रीम या तेल की कुछ बूंदें अपने हाथ में लें। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर तेल या क्रीम को थोड़ा गर्म करें।
  • बेहद सौम्यता से इसे शिशु की त्वचा पर लगाएं। शुरुआत टांगों से करें।
  • नीचे से मालिश करते हुए टांगों के ऊपर की तरफ जाएं। आप सौम्यता से दूध दुहने के अंदाज में उसकी जांघों से नीचे पैरों की उंगलियों तक जाएं।
  • यही तरीका उसकी बाजूओं और हाथों पर आजमाएं। उसके कंधों से शुरु करते हुए नीचे उंगलियों तक आएं।
  • शिशु के पैरों की उंगलियां एक-एक करके अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच लेकर सौम्यता से बाहर की ओर खींचें। यही प्रक्रिया हाथों की उंगलियों पर भी दोहराइए। शिशु की उंगलियों के जोड़ों को चटकाने का प्रयास न करें, इससे उसे दर्द या चोट पहुंच सकती है।
  • शिशु की छाती और पेट पर घड़ी की सुई की दिशा में गोलाकार में मालिश कीजिए। शिशु के पेट पर हल्के दबाव के साथ की गई गोलाकार मालिश उसके पाचन तंत्र में सुधार ला सकती है।
  • घुटने के नीचे की तरफ से शिशु की टांगों को पकड़ें और ऊपर की तरफ उन्हें मोड़ते हुए, उसके घुटनों को हल्के से पेट पर दबाएं। इससे उसे पेट के अंदर की गैस को निकालने में मदद मिलेगी।
  • शिशु की छाती से जांघों तक लंबे हाथ फेरते हुए आगे की मालिश पूरी करें। अपना एक हाथ आड़ा करके शिशु की छाती पर रखें, और लंबा हाथ फेरते हुए नीचे की तरफ आएं। यही समान प्रक्रिया दूसरे हाथ के साथ भी करें और ऐसा कुछ बार दोहराएं।
  • शिशु की पीठ की मालिश करने के लिए उसे पेट के बल लिटाइए। घड़ी की सुई की दिशा के विपरीत बड़े गोलाकार अंदाज में शिशु के नितंबों से ऊपर पीठ की तरफ जाएं और फिर कंधों तक मालिश करें। शिशु की रीढ़ की हड्डी को न दबाएं, इससे शिशु को तकलीफ पहुंच सकती है।
  • जैसा कि आपने आगे की तरफ किया था, वैसे ही पीछे भी कंधों से पैरों तक लंबा हाथ फेरते हुए पीठ की मालिश पूरी करें।https://www.youtube.com/channel/UCvhlWPVRurKJ0-Sdj0qfFQg

Friday, 27 October 2017

7. शिशु के जन्म से पहले करने वाली चीजें


शिशु के जन्म से पहले करने वाली चीजें


आपके प्रसव की नियत तिथि अब पास आ रही है और जल्द ही आपका नन्हा​ शिशु आपकी गोद में होगा। यहां जानें कि शिशु के आने से पहले आपको क्या-क्या तैयारियां करने की जरुरत है।

शिशु के लिए अपने घर को तैयार करें 


अगर आपको अपने घर में कुछ विशिष्ट परिवर्तन करवाने हैं तो इनके बारे में पहले से ही योजना बनाएं।

यदि आप शिशु के साथ एक बिस्तर पर सोएंगी, तो सुनिश्चित करें कि आपका पलंग शिशु के लिए सुरक्षित हो। या फिर आप कमरे में कॉट रखने की जगह बना सकती हैं, ताकि यह आपके पलंग के साथ अच्छी तरह फिट हो सके।

शिशु की नैपी, कपड़ों, स्नान के सामान और अन्य चीजों के लिए अलग अलमारी या दराज रखें। शिशु का सामान एक निश्चित जगह पर होने से शिशु के साथ अस्पताल से घर आने पर आप सभी के लिए आसानी होगी। 

शॉपिंग लिस्ट बनाएं

यदि आपके परिवार में शिशु के जन्म से पहले उसके लिए खरीदारी न करने का रिवाज है, तो आप 'खरीदने वाली चीजों' और 'करने वाले कामों' की सूची बनाकर रखें। हर सामान के सामने आप उस दुकान का नाम लिख सकती हैं, जहां से वह मिलेगा। आप सामान का संक्षिप्त विवरण भी दे सकती हैं, कि वह कैसा दिखता है।

अपने घर को साफ और शिशु के लिए सुरक्षित बनाएं

शिशु के स्वागत के लिए घर को तैयार करने की आपकी प्रवृत्ति अब उभरने लगी होगी। इसका पूरा फायदा उठाएं!
हालांकि, खुद को थकाएं नहीं और साफ-सफाई के उत्पादों को लेकर सावधानी बरतें। क्योंकि हो सकता है इनमें से कुछ उत्पाद गर्भवती महिला के लिए सुरक्षित न हों। बेहतर है कि आप अपनी कामवाली से इन उत्पादों के इस्तेमाल के लिए कहें। 

रसोई में भी तैयारी करके रखें

जब आप नन्हें शिशु को लेकर घर आती हैं, तो हो सकता है उसके कई दिनों या हफ्तों तक, खासकर कि पहले 40 दिनों तक घर के बड़े कामकाज या खाना बनाने का काम आप न कर पाएं।
इसलिए बेहतर है कि जितनी तैयारी आप इस समय कर सकें कर लें। अपनी रसोई को सुरक्षित बनाएं और जल्दी खराब न होने वाली चीजों जैसे कि चावल, आटा, दाल, चीनी, नमक, खाना बनाने का तेल आदि का पूरा स्टॉक रखें।
आप घर के लिए जरुरी अन्य सामानों को भी पहले से लाकर रख सकती हैं, जैसे कि सफाई के उत्पाद आदि, ताकि आपको उस समय कोई जरुरी खरीदारी न करनी पड़े।

प्रसव के बाद देखभाल के लिए मदद ढूंढ लें

जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी आप यह योजना बना लें कि जब आप बहुत थकी होंगी और घर का ज्यादा काम न कर पाएंगी, तो आपकी मदद कौन कर सकता है।
यदि आपकी सास, माँ या परिवार का कोई अन्य सदस्य मदद के लिए तैयार है, तो उनके साथ पहले से ही घर के कामकाज और रसोई की जिम्मेदारियों को लेकर योजना बना लें।
यदि आपके परिवार के सदस्य आसपास नहीं रहते, तो शिशु के आने के बाद के लिए आप 24 घंटे की (लिव-इन) या पार्ट टाइम कामवाली रखने के बारे में सोच सकती हैं। 

अपने बड़े बच्चे को भी तैयारी में शामिल करें

अगर आपका पहले से एक बच्चा है, तो उसे भी नए शिशु के स्वागत की तैयारी में शामिल करें। आप उन्हें साधारण निर्णय लेने में भागीदार बना सकती हैं, जैसे कि शिशु के लिए कौन से रंग की चादरें खरीदें आदि।
यदि आप नवजात शिशु के आने से पहले अपने बड़े बच्चे की दिनचर्या में बदलाव करना चाहती हैं, तो इन्हें अपनी डिलीवरी की अनुमानित तिथि से काफी पहले करना शुरु कर दें। इन बदलावों में शिशु को शौच का प्रशिक्षण (पॉटी ट्रेनिंग) देना या उसे खुद के अलग बिस्तर पर सुलाना शुरु करना आदि शामिल है।

अपने पालतू जानवरों को भी तैयार करें

नन्हें शिशु के लिए केवल आपको और आपके पति को ही बदलाव करने की जरुरत नहीं है, बल्कि आपके पालतू जानवरों को भी इसके लिए तैयार होना पड़ता है।
बेहतर है कि आपके पालतू जानवर शिशु के कमरे में न सोएं। यदि आपका पालतू कुत्ता या बिल्ली आपके बिस्तर पर सोने का आदि है, तो उनके सोने का इंतजाम घर में किसी और जगह कर दें, ताकि उन्हें कमरे से बाहर रहने की आदत हो जाए।
आप अपने कमरे के दरवाजे के साथ छोटा गेट भी लगवा सकती हैं, ताकि पालतू कुत्ते को कमरे से दूर रखा जा सके। बिल्ली को शिशु की कॉट या प्रैम पर चढ़ने से रोकने के लिए आप बिल्ली के लिए जाली भी खरीद सकती हैं।

अस्पताल ले जाने वाले बैग को पैक करें

आपका प्रसव किसी भी समय शुरु हो सकता है, तो सभी जरुरी चीजों को इकट्ठा कर लेना अच्छा रहता है।
प्रसव और शिशु के जन्म के बाद के लिए जरुरी सभी सामान को पैक करके बैग में रख लें और इसे सामने के दरवाजे के पास रख दें।

जन्म के बाद एकांतवास की योजना बनाएं

शिशु के जन्म के बाद शुरुआती कुछ हफ्ते आप कैसे बिताती हैं, इस बात का निर्णय आप, आपके परिवार और आपकी मान्यताओं पर निर्भर करता है।
अगर आप शिशु के जन्म के बाद पहले 40 दिनअपने माता-पिता के घर बिताना चाहती हैं या फिर आप अपनी माँ या सास को अपने पास बुलाना चाहती हैं, तो इस सबकी योजना पहले से ही बना लें।
यदि आप उस दौरान अधिकांश समय घर में ही रहना चाहती हैं, तो आपको खरीदारी और अन्य कामों जैसे कि आपके बड़े बच्चे को स्कूल लाने-ले जाने आदि के लिए पहले से इंतजाम करना होगा। 

जरुरी फोन नंबर एकत्रित करें

प्रसव शुरु होने के समय पर अपनी एड्रेस बुक को ढूंढना स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना देगा।
डॉक्टर और स्थानीय अस्पताल आदि के नंबर पहले से पता कर लें और उन्हें अपनी फेवरिट्स की लिस्ट में सेव कर लें या फिर उनका प्रिंट लेकर ऐसी जगह चिपका दें जहां सब लोग उसे देख सकें।
साथ ही सहायता के लिए अन्य वैकल्पिक संपर्क सूत्रों को भी तैयार रखें, जो कि आपको अस्पताल ले जाने में मदद करें या फिर घर पर अन्य बच्चों की देखभाल कर सकें

कार्यभार दूसरों को सौंप दें

दफ्तर में, अपने वरिष्ठ अफसर और सहकर्मियों को अपने अप्वाइंटमेंट्स, कार्य की प्रगति और मेटरनिटी लीव की योजना के बारे में बता कर रखें। आपको यह भी योजना बनानी होगी कि आपके छुट्टी पर जाने के बाद आपकी जिम्मेदारियां कौन संभालेगा।
घर पर, उन सभी कार्यों की सूची बनाएं जो आप आमतौर पर करती हैं, मगर प्रसव से ठीक पहले या बाद में उन्हें नहीं कर पाएंगी। इस तरह आपके पति को पता होगा कि वास्तव में क्या और कब करना है। इसके कुछ उदाहरण हैं:
अगले गैस सिलिंडर की बुकिंग कैसे और कब करनी हैपानी के फिल्टर की सर्विस कब होनी हैफोन के बिल का भुगतान कब करना हैप्रसव की नियत तिथि से पहले अपने कार की सर्विस करवाना, ताकि जरुरत पड़ने पर कोई मुश्किल खड़ी न हो।
शिशु के  लिए पसंदीदा नामों का चयन कर लें

आपको अभी से शिशु के नाम को लेकर अंतिम फैसला नहीं करना है, मगर पसंदीदा नामों की सूची तैयार होने से नन्हें शिशु के आने पर उसमें से एक नाम चुनना आसान होगा।
अपने शिशु के लिए एकदम उचित नाम चुनने के लिए हमारे पास बहुत से साधन उपलब्ध हैं।
बेबी नेम फाइंडरबेबी नेम आइडियाजसर्वाधिक लोकप्रिय भारतीय शिशुओं के नामशिशुओं का नामकरण आसान बनाना के लिए आप हमारी बेबी नेम लिस्ट का प्रिंटआउट भी ले सकती है आप चाहें तो अपने मोबाइल से भी फोटो ले सकते हैं।


अंजन्मे शिशु की माँ के गर्भ में होने वाली हलचले या किक्स, एक माँ के लिए एक ना भूले जाने वाला पल होता है। बच्चे के जन्‍म से पहले या यह कहे कि उसके जन्म से बहुत पहले ही माता-पिता को बहुत तैयारी करनी पड़ती हैं।

माता-पिता बनने का एहसास एक ऐसा लम्हा होता है जब आपकी हर एक गूगल सर्च एक ही चीज़ पर आ कर रुक जाती है – नवजात शिशु के लिए खरीदे जाने वाले सामान की लिस्ट।
आप भी जानते है कि नवजात बच्चे के घर आने के बाद, कुछ समय के लिए तो आप बँध जाओगे और उस टाइम में शापिंग का तो सवाल ही नही उठता।
डिलिवरी के बाद आपको भी फिट होने में टाइम लगेगा। ज़ाहिर सी बात है कि शुरूआत के दिनों में आपका कही भी जा पाना संभव नही होगा, फिर चाहे आपकी नॉर्मल डिलिवरी है या सीज़ेरियन। इसके साथ-साथ आपके नवजात शिशु को भी आपकी पूरी जरूरत होगी। इस लिए नवजात शिशु के लिए कुछ जरूरी चीज़ों को उसके आने से पहले ही खरीद लेने में समझदारी होती है। यह सब चीज़ें इस प्रकार हैं।


नवजात शिशु का कमरा



एक्सपर्ट्स के मुताबिक नवजात शिशु का कमरा, उसमें इस्तेमाल होने वाले रंग, फर्नीचर, और बाकी जरूरत का साजो-समान, उसके व्यक्तित्व पर असर डालेंगे।
जब बात बच्चे के भविष्य की हो तो कोई समझौता हो ही नही सकता और ना ही इसको मज़ाक में लिया जा सकता है। इस में किसी किस्म की लापरवाही का मतलब है, अपने बच्चे के भविष्य से खिलवाड़ करना।
अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा डॉक्टर बने, इंजिनियर बने, फिल्मी अदाकार बने, गायक बने, खिलाड़ी बने या सूपर हीरो बने; आपको उसकी तैयारी उसके पहले दिन से ही करनी पड़ेगी। यकीन मानिए, पहले की गई तैयारी बाद में आपका बहुत बड़ा मसला हल करेगी।

नवजात शिशु के कमरे की रूप-रेखा

अगर आपको इस बारे में कोई जानकारी नहीं है तो इसमे कोई हैरानी की बात नहीं है। लेकिन फिर भी, कमरे की रूप-रेखा के बारे में सोचना कोई मुश्किल बात नहीं है। इससे पहले की आप नवजात शिशु के कमरे में कोई भी बदलाव करे, आपको एक लिस्ट बना लेनी चाहिए।
सबसे पहले आपको आपने बच्चे के कमरे को समझना होगा। जी नहीं, आप इसको टाल नही सकते क्योंकि अगर आज आपको टाल देंगे, तो आपको बाद में पछताना पड़ेगा।

आपको, खुद से यह सवाल करने चाहिए –

कमरे में रोशनी कहाँ से आएगी? जरूरत से ज़्यादा रोशनी आपके बच्चे की नींद खराब करेगी और वो पूरी नींद नहीं ले पाएगा और वक़्त से पहले उठ जाएगा। क्या आप अपने बच्चे का बिस्तर ऐसी जगह प्लान कर रहे है जिसके पास कोई खिड़की है जहाँ से सर्दियों में ठंडी हवा आएगी? ऐसी छोटी छोटी चीज़े आपको अपने बच्चे के बेडरूम की जगह निर्धारित करने में बहुत मदद करेगी।

जरूरी फर्निचर

नवजात शिशु को घर लाने से पहले आपको कुछ फर्निचर जरूर खरीद लेना चाहिए। कुछ चीज़े जैसे सोने के लिए पालना, डाइपर बदलने के लिए कोई फोम या गद्दे वाला आरामदायक और सेफ मेज़, शिशु के कपड़े रखने के लिए कोई कपबोर्ड या अलमारी जिसमे जरूरत के हिसाब से खाने हो, स्तनपान करवाने के लिए कुर्सी और मेज़, और अगर आप बच्चे को ज़मीन पर लिटा के मालिश इत्यादि करना चाहती है तो उसके लिए कोई मखमली सा कंबल। यह सब चीज़ों का इंतेज़ाम पहले से ही कर लें।

बच्चे के कमरे के रंग

बच्चे के कमरे के रंग बड़ों के कमरे के रंगों से एकदम अलग तरीके से चुने जाते हैं। यहाँ पर आपको थोड़ी कलाकारी सीखनी ही पड़ेगी। प्रयोग करके देखें; दो दीवारों पर एक जैसा रंग और बाकी बची दो दीवारों पर कुछ हलका रंग करके देखें। रंग बड़े ध्यान से चुने क्योंकि रंगों से ही सारे कमरे की रौनक है।

बच्चे के कमरे के पर्दे

बच्चे के कमरे के पर्दे चुनते समय कुछ चीज़ों का खास तौर पर ध्यान रखा जाना चाहिए, जैसे कि पर्दे के रंग, पर्दे की लंबाई, और पर्दे टांगने की रॉड। रॉड वाले पर्दे से दुर्घटना का डर बना रहता है। जैसे ही आपका बच्चा चीज़ों को पकड़-पकड़ के चलने लगता है, तो ज़ाहिर सी बात है कि वो पर्दों को पकड़ के भी चलने की कोशिश करेगा और ऐसे में पर्दे के उपर से गिरने का ख़तरा ज़्यादा होता है। ध्यान रखे कि पर्दों की लंबाई ज़्यादा ना हो ताकि आपका बच्चा उसमे फँस कर ना गिरे।

घर की सफाई

गर्भावस्था में खुद से झाड़पोंछ करना ख़तरनाक हो सकता है, आप गिर भी सकती है और आपको धूल मिट्टी से एलर्जी भी हो सकती है। तो, बेहतर रहेगा कि इस काम में किसी का साथ ले लिया जाए। बहुत सी ऐसी संस्थाएँ है जो इस तरह की साफ़ सफाई में निपुण होती है। किसी ऐसे एक्सपर्ट की मदद ले लेनी चाहिए जो मुश्किल से मुश्किल कोने में भी सफाई करना जानता हो।
यह नीचे एक लिस्ट दी गई है। ऐसी ही एक लिस्ट आप बना ले और हो सके तो उसका प्रिंट भी ले ले। इससे आपको यह पता चल जाएगा की आपको उपर लिखे सब छोटे बड़े बदलाव करने के लिए कितने पैसे की जरूरत पड़ेगी।

डाइपर या कपड़े बदलने के लिए एक चेंजिंग टेबलबेबी वाइप्स, बेबी डाइपर, बेबी ओवरॉल, लंगोट – देख लीजिए कि उस समय मौसम क्या होगाएक दो कंबल या स्वेडल रैप – नवजात शिशु को अच्छी तरह से लपेटेने के लिएएक या दो जंप सूट और उसके उपर पहने जाने वाले स्वेटर भी ले ले (अगर आपका बच्चा सर्दियों में आएगा)फर्नीचर में – बच्चे का पालना, स्तनपान के लिए कुर्सी मेज़, कपड़े रखने के लिए कपबोर्ड, पालने के लिए एक गद्दा, कुछ बेड-शीट्स और कंबल, और ज़मीन पर बिछाने के लिए एक छोटा गद्दानहलाने के लिए एक छोटा टब जो ज़्यादा गहरा बिल्कुल ना हो, कुछ नर्म तौलिये, नहाने का साबुन, और टियर फ्री शैम्पूअगर आप गाड़ी चलाते हैं तो, बच्चे की सीट जो खास तौर पर कार के लिए बनाई जाती हैएक स्ट्रोलरस्तनपान के लिए कम से कम दो नर्सिंग ब्रा और पेड्सदूध पीने की बोतल और उनको 
इनके साथ साथ अपने लिए भी कुछ खुले कपड़े ले ले। शिशु होने के बाद कुछ महीनो तक आप अपना वजन कम नही कर पाएँगी।
सबसे जरूरी बात, एक बढ़िया सा शिशु विशेषज्ञ जरूर ढूंढ लें। ध्यान रहे की यह एक ऐसा विशेषज्ञ हो जो हर समय आपके लिए उपलब्‍ध हो। जिस भी डॉक्टर ने आपकी डिलिवरी की है, उसी से पूछिए क्योंकि उसके पास कोई ना कोई सुझाव अवश्य होगा।


6.शिशु के मालिश के लिए कब कौन सा तेल का उपयोग करे?




मौसम के हिसाब से शिशु के लिये तेल का चुनाव

शिशु को नहलाने से पहले उसकी तेल से मालिश करना भारत में किसी परंपरा की तरह है। इससे पहले हमने ये बताया था कि शिशु की मालिश के लिये कौंन से तेल सबसे बेहतर हैं। लेकिन ऐसे में एक बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हर मौसम में एक ही तरह के तेल से शिशु की मालिश की जा सकती है? जी नहीं, आपको अपने शिशु की मालिश के लिये मौसम के हिसाब से तेल का चुनाव करना होता है। तो चलिये जानें बच्चे की मसाज के लिए किस मौसम में कौन सा तेल है सही -    

गर्मियों में बच्चे की मालिश के लिए सबसे अच्छा तेल

गर्मी के महीनों में नारियल के तेल को बच्चे की मालिश के लिये सबसे अच्छा तेल माना जाता है। इससे शिशु की मसाज करने पर शरीर पर शीतलन प्रभाव पड़ता है। इसी तरह, तिल का तेल (sesame oil) भी कई क्षेत्रों में एक लोकप्रिय विकल्प है। हालांकि, जैतून और बादाम के तेल अन्य वनस्पति तेलों की तुलना में अधिक महंगे होते हैं, ये गर्म या ठंडे दोनों ही मौसम में अच्छी तरह से काम करते हैं।

सर्दियों के मौसम में बच्चों के लिये बेस्ट तेल

सरसों का तेल ठंड के मौसम में मालिश करने के लिये सबसे अच्छा होता है, क्योंकि ये शरीर को गर्मी प्रदान करता है। देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में सरसों के तेल को मालिश के लिये लहसुन और मेथी बीज के साथ गरम किया जाता है। दरअसल लहसुन में एंटीवायरल और जीवाणुरोधी गुण होते हैं, और माना जाता है कि यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है। वहीं मेथी बीज शरीर को आराम देने के लिए जाना जाता है। वहीं कुछ जगहों पर सरसों के तेल को मसाज से पहले अजवाइन डालकर गर्म किया जाता है। यदि आप इसकी तीखी गंध की वजह से सरसों के तेल का उपयोग करना पसंद नहीं करते हैं, तो आप विकल्प के तौर पर बादाम या जैतून का तेल इस्तेमाल कर सकते हैं।

क्या देशी घी, मलाई या बेसन से बच्चे की मसाज सही है?

संभव हो तो देशी घी से शिशु की मालिश ना ही करें, क्योंकि यह काफी चिपचिपा होता है और बच्चे के पोर्स (pores) को बंद कर सकता है। साथ ही मलाई, बेसन या हल्दी आदि से भी शिशु की मसाज ना करें। ये बच्चे की त्वचा पर चकत्ते या जलन पैदा कर सकते हैं। शिशु की मसाज के लिये कच्चे दूध का उपयोग करना भी एक अच्छा विचार नहीं होता है, क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा होता है। कच्चे दूध में बैक्टीरिया हो सकता है, जिसके कारण दस्त, या टीबी जैसे संक्रमण हो सकते हैं। सात ही अरोमाथेरेपी (Aromatherapy) तेलों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ये बेहद कठोर होते हैं और बच्चे की कोमल और संवेदनशील त्वचा के लिए अनुपयुक्त हैं।

संवेदनशील त्वचा वाले शिशु के लिये मसाज ऑयल

यदि बच्चे की त्वचा संवेदनशील हो, एक्जिमा हो या वह टूट रही हो तो वनस्पति तेलों जैसे, जैतून का तेल या उच्च ओलिक सूरजमुखी तेल का उपयोग नहीं करना चाहिये। इन तेलों में फैटी एसिड जिसे ओलेक एसिड (oleic acid) कहा जाता है, उच्च मात्रा में होता है। ओलेक एसिड बच्चे की त्वचा को अधिक शुष्क बना सकता है। इसके बजाए वनस्पति तेलों, जिनेमें लिनोलेनिक एसिड उच्च होता है, संवेदनशील त्वचा के लिए बेहतर होते हैं।



बच्‍चों की मालिश के लिये 10 लाभकारी तेल


बच्‍चों के शरीर में तेल की मालिश से ताकत आती है, इसलिए छोटे बच्‍चों की हर दिन मालिश की जाती है ताकि उनका शरीर स्‍वस्‍थ बना रहें। बच्‍चों की मालिश के लिए कई प्रकार के तेल आते हैं और लोगों का हर तेल के बारे में अलग मत होता है।

स्‍टेप बाई स्‍टेप ऐसे करें अपने बच्चे की मालिश

सच्‍चाई तो यह है कि तेल की हर बूंद बच्‍चे के शरीर में ताकत लाता है, उसके शरीर को पोषण प्रदान करता है। इससे बच्‍चे की त्‍वचा मुलायम रहती है और उसकी त्‍वचा को अतिरिक्‍त मॉइश्‍चर भी मिलता है।

नारियल का तेल

इस तेल को कई जगह गरी का तेल भी कहा जाता है। यह तेल, नाजुक त्‍वचा के काफी लाभकारी होता है। इसे लगाने से बच्‍चे के शरीर के इंफेक्‍शन आदि भी सही हो जाते हैं।

जैतून का तेल

जैतून के तेल से शरीर में ताकत आती है। अगर बच्‍चा बहुत ज्‍यादा कमजोर है तो जैतून के तेल से ही मालिश करें। इससे त्‍वचा को पूरा पोषण मिलेगा और किसी भी प्रकार की पपड़ी आदि नहीं जमेगी, जिससे बच्‍चे की त्‍वचा पर दाने हो जाएं।

सरसों का तेल

सरसों का तेल बच्‍चों के लिए वरदान माना जाता है। इससे मालिश करने से शरीर में रक्‍त का संचार अच्‍छी तरह होता है। त्‍वचा को पोषण और शरीर को मजबूती मिलती है। यह ज्‍यादा मंहगा नहीं होता है तो इसे हर वर्ग के लोग आसानी से बच्‍चे के लिए खरीद सकते हैं।

तिल का तेल

अगर आपके बच्‍चे की त्‍वचा खींच जाती है तो तिल का तेल लगाएं और उसी से मालिश करें। यह तेल मालिश करने के लिए काफी अच्‍छा माना जाता है लेकिन यह नकली न हों, वरना इससे नुकसान भी हो सकता है। इस तेल को लगाने से शरीर में गर्माहट आती है इसलिए इस तेल को सर्दियों के दिनों में इस्‍तेमाल करें।

बादाम का तेल

बादाम का तेल बच्‍चे ही नहीं हर उम्र के लोगों के लिए लाभप्रद होता है। इसमें विटामिन ई की भरपूर मात्रा होती है जिससे शरीर को ताकत मिलती है।

सूरजमुखी का तेल

सूरजमूखी का तेल सामान्‍य तौर पर खाने के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है और यह त्‍वचा के लिए पूरी तरह से सुरक्षित होता है। इसमें विटामिन ई और फैटी एसिड होता है जो शरीर को मजबूती प्रदान करता है। इससे बच्‍चे की त्‍वचा पोषित करने से उसके शरीर को काफी लाभ होगा।

चमेली का तेल

यह एक बढि़या तेल होता है जिसमें नवजात शिशु की त्‍वचा के लिए सभी आवश्‍यक तत्‍व होते हैं। इसे लगाने से बच्‍चे की त्‍वचा में रैशेज नहीं पड़ते हैं और उसे किसी प्रकार का संक्रमण भी नहीं होता है।

चाय के पत्ती का तेल

डॉक्‍टर्स का मानना है कि चाय की पत्‍ती से निकला हुआ तेल बहुत फायदेमंद होता है। यह प्राकृतिक होता है और इसमें एंटी-बॉयोटिक गुण होते है जो बच्‍चे के लिए लाभकारी होते है।
कैलेंडुला के फूल का तेल 

आपने कैलेंडुला के फूल के बारे में सुना है लेकिन इसके ऑयल के बारे में भी जानिए। इसके तेल में कई गुण छुपे होते है जो नाजुक त्‍वचा की नमी को बनाएं रखते हैं और उसके मजबूती भी देते हैं।

अरंडी का तेल

अरंडी के तेल के बारे में आप सभी ने सुना होगा। यह तेल बच्‍चे की त्‍वचा को पोषण प्रदान करता है और त्‍वचा, बालों और नाखूनों को मजबूत बनाता है। इन्‍हे ड्राई होने से बचाता है। इसे बच्‍चे की अांखों और ओठों पर न लगने दें।

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Thursday, 26 October 2017

5. नवजात शिशु की नियमित मालिश कैसे करे

नवजात शिशु की नियमित  मालिश कैसे करे

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1. नियमित ऐसे करें अपने बच्चे की मालिश-

बच्चे के पैदा होते ही उनकी मालिश की जाती है ताकि उनकी हड्डियां व मांसपेशियां मजबूत रहें। मालिश बच्चे के शरीर को एक सही आकार लेने में मदद करती है। मालिश अपने प्यार व स्नेह को व्यक्त करने का एक अच्छा तरीका है। मां द्वारा की गई मालिश माँ और बच्चे के बीच एक गहरा रिश्ता कायम करने में मदद करती है। इसके अलावा, मालिश आपके बच्चे के वजन को बढाने में, रक्त परिसंचरण को व बच्चे के पाचन तंत्र को सुधारने में मदद करती है।
फोटो २ 

मालिश के बाद आपका बच्चा चैन की नींद सो पाता है। मालिश केवल बच्चे की ही नहीं बल्कि आपकी भी थकन को दूर कर देगी। मालिश आपके बच्चे को मानसिक व शारीरिक रुप से विकसित होने में मदद करती है। एक अध्ययन के अनुसार मालिश नवजात शिशुओं को पीलिया से लड़ने में मदद करती है। मालिश से बच्चों में चिड़चिड़ापन कम होता है।

2. शिशु को मालिश के लीये क्या  बोलते हैं डॉक्‍टर्स

मालिश करने के लिए एक सही समय निर्धारित करें। दूध पिलाने के बाद बच्चे की मालिश ना करें क्योंकि उसे उल्टी हो सकती है। नींद के दौरान की गई मालिश का आनंद बच्चे ले नहीं पाते हैं। अगर मालिश के दौरान आपका बच्चा रोने लगे तो समझ लें कि वह मालिश से थक गया है। वहीं उसकी मुस्कान उसके आनंद का प्रतीक होगी। आगे इस लेख में बच्चों के अलग-अलग अंगों की मालिश के तरीके दिए गए हैं।
मालिश को हमेशा हलके हाथों से करें ताकि आपका बच्चा उसका पूरा मज़ा ले सके। मालिश के लिए फर्श पर एक तौलिया बिछाएं तथा किसी वनस्पति तेल से बच्चे के शरीर की मालिश करें। अगर मालिश के दौरान आपका बच्चा रोने लगे तो उसे गले से लगाकर चुप कराएं। कभी भी बच्चे की मालिश दूध पीने के बाद व सोते वक़्त ना करें। यह 6 महीने से कम उम्र वाले बच्चों की हड्डियों व मांसपेशियों को मजबूत बनाने का एक अच्छा तरीका है।

बच्चे की थकान को दूर करने के लिए मालिश की शुरुआत पैरों से करें। इसके लिए अपने हाथों पर तेल को मलें तथा जांघों को मलते हुए नीचे पैरों तक आएं। एक पैर की मालिश के बाद दूसरे पैर की मालिश भी इसी तरह करें।
फोटो ३ 
पैरों की मालिश को आरंभ करने से पहले बच्चे के पैरों को दोनों दिशाओं में घुमाएं। फिर मालिश को टखने से शुरु करते हुए ऊपर उंगलियों तक लेकर जाएं। इस प्रक्रिया को दोनों पैरों पर दौहराएं
अपने अंगूठे से बच्चे की छोटी-छोटी एड़ियों की मालिश करें। मालिश के दौरान आपका अंगूठा चक्राकार में घुमना चाहिए।

बच्चे की पैरों की उंगलियों को अपने हाथों की उंगलियों के बीच में लेकर हल्के से ऊपर की ओर खींचे। इस तरह हर एक उंगली की मालिश करें।
भुजाओं की मालिश भी टांगों की तरह की करें। हाथों पर तेल लगाकर भुजाओं को मलते हुए नीचे कलाई तक आएं। फिर उसकी कलाई को धीरे से दोनों दिशाओं में घुमाएं।
बच्चे के हाथ को अपने हाथों में लें व हलके हाथों से उसकी हथेली की मालिश करें। इस प्रक्रिया को दूसरे हाथ पर भी दौहराएं।
हाथ की उंगलियों को अपने हाथों की उंगलियों के बीच में लेकर हल्के से ऊपर की ओर खींचे। इस मालिश की शुरुआत हाथ की कानी उंगली से आरंभ करके अगूंठे पर खत्म करें। दूसरे हाथ की उंगलियों की मालिश भी इसी तरह करें।
फोटो ४ 


अपने हाथों को जोडते हुए बच्चे की छाती से थोडा सा ऊपर रखें। फिर हाथों को खोलते हुए छाती पर रखें तथा मालिश ऊपर की ओर को करें। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराएं।

अगली प्रक्रिया के लिए भी हाथों को इसी तरह जोडकर खोलें तथा अब मालिश को ऊपर की ओर करने के बजाय नीचे जांघों की ओर करें। इस पूरी मालिश को हलके हाथों से करे
बच्चे को पेट के बल लेटाएं व अपनी उंगलियों से उसकी पूरी पीठ की मालिश करें। इसके बाद कंधों से लेकर पैरों तक की मालिश करें। मालिश के बाद अपने बच्चे को दूध पिलाएं। इस आरामदायक मालिश के बाद बच्चे जल्द ही अपनी सपनों की दुनिया में खो जाएंगे

मालिश के 5 महत्वपूर्ण Tips-

1. बच्चों की मालिश धूप में लिटाकर करनी चाहिए, ताकि उनके शरीर को सूर्य किरणों से 'विटामिन डी' मिल सके। इससे त्वचा विकाररहित और हड्डी मजबूत होगी।

2. कमजोर, अविकसित शरीर वाले और किसी रोग के कारण दुर्बल हुए बच्चों की मालिश कॉड लिवर ऑइल या बादाम के तेल से करना अधिक लाभप्रद रहता है।

.बच्चे की मालिश नौकरानी से न करवाकर माता को स्वयं करना चाहिए। माँ की ममता और शिशु के प्रति मंगलकारी भावना का बच्चे पर पूरा प्रभाव पड़ता है और मालिश भी सुरक्षित ढंग से होती है। किसी रोग विशेष की स्थिति हो तो फिर विशेषज्ञ से मसाज कराना चाहिए।

4. बच्चे की मालिश जैतून के तेल, मक्खन या गोघृत से करना चाहिए। यदि ये पदार्थ उपलब्ध न हो सकें तो खाने के तेल, नारियल या सरसों का तेल प्रयोग करें।

5. बच्चों की मालिश कोमलता से, हलका दबाव देते हुए और सावधानी से करना चाहिए। जोड़ों पर गोलाकार हाथ चलाकर चारों तरफ मालिश करके अंग को 8-10 बार चलाकर जोड़ों को व्यायाम देना चाहिए। इससे जोड़ मजबूत और शुद्ध होते हैं। नवजात शिशु की 40 दिन तक कम से कम और अधिक से अधिक छह माह तक लोई करके मालिश की जाए तो बहुत हितकारी होगा।

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4. जानिये नवजात शिशु की कैसे करें देखभाल

** जानिये नवजात शिशु की कैसे करें देखभाल **

फोटो गैलरी १ 

          नौ महीने तक कोख में पालने और असहनीय प्रसव पीड़ा के बाद जब आपके गोद में बच्चे की किलकारियां गूंजती है तो आपकी खुशी दोगुनी हो जाती है। मगर इस खुशी के साथ आपकी जिम्मेवारियां भी बढ़ जाती है। मां बनने की जिम्मेवारी पहली बार मां बनने के समय आपको यह पता नहीं होता है कि बच्चे की देखभाल कैसे करें। कैसे उसे गोद में लें, कैसे उसे दूध पिलाएं, कैसे उसे नहलाएं...।
      ऐसी कई जिम्मेवारियां है जो माता-पिता को बच्चे के जन्म से लोकर पांच साल तक काफी सावधानी और समझदारी से उठानी पड़ती है। मगर आप घबराएं नहीं, हम आपको बताने जा रहें हैं नवजात के देखभाल के सबसे आसान और सुरक्षित तरीके।


  • जानें कैसे उठाएं नवजात शिशु  को गोद में 



हो सकता है कि आप अपने कोमल और नाजुक बच्चे को गोद में उठाने से पहले डर से सिहर जाए। आपको डर लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ी हो जाए तो...। मगर डरे नहीं। बस कुछ ऐसे बेसिक तकनीक को आजमाएं और आराम से बच्चे को गोद में उठाएं और उसे लाड़-प्यार करें। नवजात शिशु को गोद में उठाने से पहले हाथ को एंटी-सेप्टिक सेनेटाइजर लिक्विड से अच्छी तरह धो लें ताकि बच्चे को कोई संक्रमण का खतरा न हो। बच्चों की रोग प्रतिरोधी क्षमता उतनी मजबूत नहीं होती है और वो बहुत जल्दी संक्रमण का शिकार हो जाते हैं।

बच्चे को उठाते समय उसके सिर और गर्दन को ठीक से पकड़े रहें, जैसे उनको सपोर्ट दे रहे हों। एक हाथ सिर और गर्दन के नीचे और एक हाथ पैर के नीचे रखें और फिर पालने के झूले की तरह बच्चे को सपोर्ट दें।बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि वो झूले पर झूल रहा है। बच्चे को पालने की तरह हल्का उपर और नीचे झुलाएं। ध्यान रहे नवजात को ज्यादा उपर या नीचे ना झुलाएं। यह खतरनाक हो सकता है। ना ही बच्चे का सिर ज्यादा हिलाएं। इससे SIDS ) का भी खतरा रहता है।नवजात को कभी भी जोर से झकझोरें या हिलाए नहीं, चाहे आप उससे खेल में ठिठोली कर रहे हों या गुस्से में ही क्यों न हो। इससे बच्चे के सिर में खून रिसने लगेगा और मौत भी हो सकती है। कभी भी नवजात को सोते समय झकझोड़ कर नहीं उठाए। इससे बेहतर है कि उसके पैर में हल्की चिकोटी काटे या सहलाएं या फिर गालों को सहलाएं।
याद रहें नवजात को हमेशा नर्म और मखमली स्पर्श ही करें।नवजात को नर्म और गर्म कपड़े में लपेट कर रखने के लिए सीखें। इससे बच्चा काफी सुरक्षित महसूस करता है। 0-2 महीने तक शिशु को जरुर लपेटकर रखें। इससे बच्चे को वातावरण के बदलाव का ज्यादा असर नहीं पड़ता है।


जाने नवजात को पकड़ने और संभालने का तरीका 



नवजात को गोद में लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपके हाथ के नीचे बच्चे का सिर और गर्दन सही तरीके से है कि नहीं। जब-जब बच्चे को गोद में लेने के लिए उठाएं तो सिर और गर्दन को जितना सपोर्ट मिलेगा उतना अच्छा रहेगा। गोद में बच्चे के सिर को अपने कोहनी के नीचे आराम करने दे औप पूरे शरीर को अपने बांह पर। जब तक बच्चा गोद में रहे उसके मूवमेंट पर पूरा ध्यान बनाकर रखें।

जाने बच्चे को आराम करने और सुलाने का तरीका 

नवजात के सेहत के लिए तीन महीने तक काफी आराम की जरुरत होती है। इस दौरान बच्चे 16 से 20 घंटा तक सो (आराम कर) सकते हैं। तीन महीने के बाद बच्चे 6 से 8 घंटे तक सोते हैं।बच्चे सो रहे हैं या आराम कर रहे हैं तो उन्हें हर चार घंटे पर स्तनपान कराना न भूलें। रात में भी बच्चे तीन महीने तक 6 से 8 घंटे तक पूरी रात सोते हैं। अगर रात में बच्चे ठीक से मतलब 2 से 3 घंटे भी नहीं सो पा रहे हैं तो यह चिंता का विषय है।बच्चे जिस तकिया पर सो रहा है/ रही है वो काफी हल्का और नर्म होना चाहिए, और तकिया पर एक ही जगह बच्चे का सिर ज्यादा देर तक नहीं रहना चाहिए, ऐसा रहने से सिर का आकार गड़बड़ा सकता है और SIDS का खतरा हो सकता है। बच्चे के सिर के पोजीशन को तकिया पर बदलते रहे। पहले दाएं, फिर बाएं और फिर बीच में।नवजात को दिन और रात का अनुभव नहीं होता है। कभी-कभी कोई-कोई बच्चा रात को ज्यादा अलर्ट हो जाता है, जगा रहता है और पूरे दिन सोता रहता है। ऐसी स्थिति में रात में बच्चे के कमरे में नीम अंधेरा कर दें। दिन में हो सके तो बच्चे को थपथपा कर जगाएं और उसके साथ खेलें और बातचीत करें ताकि रात को वो सही से सो सके।

जाने कैसे कराएं स्तनपान-
फोटो गैलरी २ 

          मां का दूध एक संपूर्ण और संतुलित आहार है। नवजात शिशुओं को उनके शुरुआती छह महीने में केवल मां के दूध की ही जरुरत होती है। यह शिशु को सभी जरुरी पोषक तत्व प्रदान करता है। अगर आपको दूध आता है तो अपने शिशु को 6 महीने तक जरुर स्तनपान कराएं।
         प्रसव के तुरंत बाद मां का दूध पीलेपन वाला और गाढ़ा होता है। इस दूध को कोलोस्ट्रम(गाढ़ा दूध या खीस) कहते हैं। कोलस्ट्रम परिपक्व दूध (मेच्योर मिल्क) से अधिक पोषक होता है, क्योंकि इसमें अधिक प्रोटीन, संक्रमण से लड़ने वाली अधिक खूबियां होती है। यह आपके शिशु को संक्रमण से होने वाली खतरनाक बीमारी से बचाती है। इसमें विटामिन ए की भी मात्रा अधिक होती है।स्तनपान के लिए शिशु और मां का सही पोस्चर होना जरुरी है। दोनों बाजु में शिशु को उठा कर उसके पूरे शरीर को अपनी और करें। शिशु के उपरी होंठ में अपने स्तन के निपल को सटाएं और जब शिशु अपना पुरा मुंह खोल दे तो अपने स्तन के निपल को अंदर कर दें। आपका शिशु जब जाहे उसे अपने स्तन का निपल चूसने दें।
         स्तनपान कराने के बाद रोजाना नहाते समय साफ पानी से स्तनों को धोएं। दूध पिलाने के बाद स्तनों को साफ कपड़े से पोछें या दोबारा कपड़े से ढ़कने से पहले उन्हें स्वाभाविक रुप से सूखने दें।अगर आप शिशु को स्तनपान करा रहीं हैं तो ध्यान रहे इसके स्थान पर चीनी घुला पानी, शहद घुला पानी या अन्य कुछ उल्टी-सीधी चीजें कभी न दें।  अगर आपका शिशु काफी देर तक स्तनपान कर रहा है तो वो पूरे दिन में 6 से 8 बार डायपर गीला कर सकता है। पेट भी गड़बड़ हो सकती है। मगर इससे घबराए नहीं। अगर चार बार से ज्यादा डायपर को गीला करता है तो डॉक्टर के पास जाएं।अगर आप स्तनपान करा रहीं है तो कुछ भी उल्टा-सीधा न खाएं। दाल का सेवन ज्यादा करें और पोषक आहार खाएं। इससे स्तन में दूध भरेगा और गाढ़ा होगा। धूम्रपान और नशा न करें।अगर प्रसव के तुरंत बाद स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो नर्स से संपर्क करें। धैर्य रखें और पोषक आहार का सेवन करते रहें, दो से तीन दिन में स्तन में दूध आने लगेगा।


जानें कैसे कराएं बोतल फीडिंग -


फोटो गैलरी ३ 

अपने शिशु को स्तनपान कराना है या पाउडर के दूध की बोतल फीडिंग करानी है यह फैसला आपका निजी फैसला है। हालांकि जन्म के छह महीने तक बच्चे को मां का दूध ही पिलाना चाहिए। नवजात शिशु के लिए दूध पाउडर का उपयोग करने से पहले यह ध्यान रहे कि इसकी एक खास मात्रा होती है और इसे कैसे बनाना है आदि दूध के डिब्बे पर निर्देश पढ़ने के बाद ही शुरु करें। 

       बोतल फीडिंग से पहले इन बातों का रखें ख्याल बोतल को उबले पानी से धोएं। उबले पानी से साफ नहीं की गई बोतल या गलत मात्रा में दूध का पाउडर मिलाने से बच्चा बीमार हो सकता है।हर तीन घंटे पर शिशु को बोतल फीडिंग कराएं या जब भूख लगे तब।भूल कर भी बोतल में बचे दूध को फ्रीज में न रखें और उसी दूध को दोबारा न पिलाएं, हर बार ताजा बना हुआ दूध ही बच्चे को पिलाएं।शिशु को बोतल फीडिंग हमेशा 45 डिग्री के कोण मे रख कर पिलाएं। ध्यान रहे बोतल खाली होने पर बच्चा हवा तो नहीं चूस रहा है।


जाने शिशु को डायपर पहनाने के तरीके -


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आप डिस्पोजेबल डायपर बच्चों को पहना रही हैं या फिर कपड़े का डायपर, इसकी आपको सही से देखभाल करनी होगी। कब डायपर बदलनी है और साफ-सफाई का कैसे ख्याल रखना है इसके लिए सचेत रहना होगा।
अगर आप कपड़े का डायपर बच्चे को पहना रही है तो ध्यान रहे यह साफ होना चाहिए। कपड़ों के डायपर को गर्म पानी में एंटी सेप्टिक लिक्वड डाल कर साफ करें, ताकि संक्रमण का खतरा न रहे। डायपर पहलाने से पहले जैतून के तेल से बच्चे को मालिश कर दें ताकि कोई स्किन रैशेज नहीं हो। डायपर हर तीन घंटे पर बदलते रहे, ज्यादा गीला होने पर बच्चे को पेशाब के संक्रमण की बीमारी हो सकती है।
डिस्पोजेबल डायपर को भी हर तीन घंटे पर बदलते रहें क्योंकि ज्यादा गीला होने पर बच्चे को पेशाब के संक्रमण की बीमारी हो सकती है। डायपर खोलने के बाद अच्छी तरह से अंदरुनी हिस्से को वाइप्स से पोछ दें। ज्यादा देर तक डायपर पहनने से स्किन पर दाग या रैशेज हो जाए तो मलहम लगाएं।
अगर बच्चे का पेट खराब है तो ध्यान रहे डायपर जितनी जल्दी हो बदलते रहें।


जाने कैसे नहलाएं शिशु को -


शिशु के जन्म लेने के बाद एक हफ्ते तक बच्चे को स्पांज बाथ दें या भींगे कपड़े से बदन पोंछ दें। जैसे ही बच्चे की नाभि-नाल (Umbilical Chord) के घाव सूख जाए बच्चे को हफ्ते में दो या तीन बार नियमित रुप से नहलाया जा सकता है। नाभि-नाल शिशु मां के गर्भ से जब निकलता है तभी ही ले कर आता है। इसे काटा जाता है और इसके घाव को सूखने में समय लगता है।
ध्यान रहे बच्चे को शुरु के छह महीने में ज्यादा ठंडे या गर्म पानी में नहीं नहलाएं। गुनगुना पानी ही बेहतर है।नहलाते समय बच्चे के दोनों कान को हाथ से अच्छी तरह से बंद कर लें ताकि कान में पानी नहीं जाए।बच्चे को नहलाने से पहले उसके कपड़े, तौलिया, डायपर, माइल्ड क्रीम सोप सभी कुछ तैयार रखें। नहलाने के तुरंत बाद बच्चे को सूखे कपड़े में लपेट लें और जल्द ही बदन पोंछ कर कपड़ा पहना दें।अगर आप बच्चे को पहली बार नहला रहीं है तो अपने साथ घर के बुजुर्ग और अनुभवी लोग को साथ रखें।बच्चे को नहलाने के लिए माइल्ड क्रीम सोप या शैंपू ही इस्तेमाल करें ताकि आंख में साबुन के पानी जाने से वो रोए नहीं। .

खतना और नाभि काटने के बाद कैसे करें देखभाल -

खतना के तुरंत बाद शिशु के शिश्न को पेट्रोलियम जेली लगे हुए गॉज से कवर कर दें ताकि घाव डायपर में सटे नहीं और घाव जल्दी सूख जाए। डायपर बदलने के बाद शिश्न के उपरी हिस्से को गर्म पाना से अच्छे से साफ कर दें। शिश्न के उपरी हिस्से का घाव हफ्ता दो हफ्ता के बाद आम तौर पर सूख जाता है, मगर घाव नहीं सूखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
ठीक उसी तरह मां के गर्भ से निकलने के तुरंत बाद जब बच्चे की नाभि-नाल काटी जाती है तो बच्चे के नाभि के पास घाव हो जाती है। नाभि-नाल काटने के तुरंत बाद स्वाब से उसको ढ़ंक देना चाहिए। घाव पर नीली दवाई जीवी पेंट भी लगाई जाती है , जिससे घाव जल्दी सूख जाती है। तीन हफ्ते के बाद घाव सूख जाती है। अगर इसके बाद भी घाव नहीं सूखे तो डॉक्टर से संपर्क करें ।

छोटे बच्‍चों (जन्‍म से 3 माह) के स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल-


          अस्‍पताल से छुट्टी दिए जाने से पहले डॉक्‍टर द्वारा आपके नवजात शिशु की जांच की जानी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह घर जाने के लिए पूरी तरह से स्‍वस्‍थ है। हमारे मैटरनिटी एण्‍ड चाइल्‍ड हैल्‍थ सेंटर में पंजीकरण के पश्‍चात् आपके बच्‍चे की नियमित जांच की व्‍यवस्‍था की जाएगी। इन शुरुआती जांचों का उद्देश्‍य ऐसी जन्‍मजात असामान्‍यताओं का पता लगाना अथवा अन्‍य महत्‍वपूर्ण नवजात अवस्‍थाओं को पता लगाना है, जिनके लिए और अधिक चिकित्‍सीय देखरेख की आवश्‍यकता हो सकती है और साथ ही इनका उद्देश्‍य भविष्‍य में प्रयोग के लिए आपके बच्‍चे की मौजूदा स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति को रिकॉर्ड करना भी है। तथापि, इन शुरुआती जांचों से जन्‍मजात सहित सभी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का पता नहीं लगाया जा सकता और इनमें से कुछ का बाद में पता चल सकता है। हालांकि ऐसा होना आम नहीं है, छोटे बच्‍चे (विशेषकर नवजात शिशु) बीमार हो सकते हैं और उनका स्‍वास्‍थ्‍य तेज़ी से ख़राब हो सकता है। इसलिए यह महत्‍वपूर्ण है कि आप यह जानते हों कि चिकित्‍सीय सहायता जल्‍दी से कब प्राप्‍त की जानी चाहिए।
बच्‍चे के गंभीर रूप से बीमार होने के संकेत निम्‍नलिखित हैं,जिन पर माता-पिता को ध्‍यान देना चाहिए और उपयुक्‍त कार्रवाई करनी चाहिए:-

सुस्‍ती और उनींदापन-

नवजात शिशु अपना अधिकतर समय सोने में व्‍यतीत करते हैं। तथापि, आपके बच्‍चे को प्रत्‍येक कुछ घंटों के बाद जाग जाना चाहिए, जागने पर अच्‍छी तरह से आहार लेना चाहिए और संतुष्‍ट और सजग दिखाई देना चाहिए। आपको उसकी नियमित दिनचर्या में आने वाले परिवर्तन के बारे में विशेष रूप से सजग रहना चाहिए – ये किसी गंभीर बीमारी के लक्ष्‍ण हो सकते हैं। यदि वह बहुत अधिक थका हुआ अथवा उनींदा नज़र आए, बहुत कम सजग दिखाई दे और आहार लेने के लिए न जागे, तो आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए।

सांस ले‍ने में कठिनाई -


नवजात शिशु को सांस लेने के सामान्‍य तरीके पर स्थिर होने के लिए अर्थात् प्रति मिनट 20-40 सांस लेना शुरू करने के लिए आमतौर पर कुछ घंटे का समय लगता है। अक्सर, जब वह सो रहा होता है तो वह सबसे अधिक नियमित रूप से सांस लेता है। कभी-कभी जब वह जागता है, तो बहुत थोड़ी देर के लिए तेज़ी से सांस ले सकता है और उसके बाद सामान्‍य तरीके पर लौट सकता है।

यदि आपको निम्‍नलिखित में से कुछ नज़र आए, तो आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए:-

लगातार तेज सांस लेना अर्थात्‍ यदि उसकी आयु दो माह से कम है, तो प्रति मिनट साठ से अधिक सांस लेना अथवा यदि उसकी आयु 2-3 माह है, तो प्रति मिनट पचास से अधिक सांस लेनासांस लेने के लिए प्रयास करना पड़ रहा हो और निगलने में कठिनाई हो रही होसांस लेते समय नथुने चौड़े दिखाई देते होंत्‍वचा और होठों का रंग सावला अथवा नीला दिखाई देता हो

रक्‍त संचार संबंधी समस्‍या-

नवजात शिशु को ठंडे वातावरण में ले जाने पर कभी-कभी उसके हाथ और पैर नीले दिखाई दे सकते हैं, लेकिन गर्म वातावरण में आने पर ये वापिस गुलाबी हो जाने चाहिए। कभी-कभार ज़ोर से रोने के लिए अपनी सांस को कुछ क्षण के लिए रोकने पर उसका चेहरा, जीभऔर होंठ थोड़े नीले हो जाने चाहिए। यदि उसके शांत हो जाने पर इनका रंग तेज़ी से सामान्‍य हो जाता है, तो आपको चिंता करनेकी ज़रूरत नहीं है। तथापि, यदि आपका बच्‍चा अचानक और लगातार पीला पड़ रहा है अथवा उसका पूरा शरीर नीला हो जाता है, तो उसे हृदय अथवा फेफड़ों संबंधी समस्‍याएं हो सकती हैं। ऐसे में तत्‍काल चिकित्‍सीय सहायता की आवश्‍यकता होती है।

शरीर में पानी की कमी (हाईड्रेशन) संबंधी अवस्‍था-

शिशुओं में आसानी से और जल्‍दी ही पानी की कमी हो जाती है। सुनिश्चित करें कि आपका बच्‍चा पर्याप्‍त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन कर रहा है, विशेषकर जब वह उल्‍टी कर रहा हो अथवा उसे दस्त लग गए हों। पिछले 24 घंटों में उस द्वारा पीए गए दूध की मात्रा की गणना करें और इसकी उसके सामान्‍य आहार से तुलना करें, जो कि पहले महीने के दौरान प्रतिदिन 10-20 आउंस (300-660 मि.ली.) होती है। यदि आप अपने बच्‍चे को स्‍तनपान करा रही हैं, तो उस द्वारा सक्रिय रूप से स्‍तनपान करने की संख्‍या और अवधि को नोट करें। यदि आप सुनिश्चित नहीं है कि आपका बच्‍चा पर्याप्‍त स्‍तनपान कर रहा है अथवा नहीं, तो आपको प्रसव कराने वाले अस्‍पताल अथवा किसी MCHC से संपर्क करना चाहिए। आप अपने बच्‍चे के पेशाब करने की आवृति और मात्रा को देखकर भी उसकी तरल पदार्थ लेने की मात्रा का पता लगा सकते हैं। यदि आपके बच्‍चे ने पिछले 24 घंटों के दौरान काफी कम मात्रा में पेशाब किया है, उदाहरण के लिए, पहले सप्‍ताह के अंत तक छोटे शिशुओं ने 6 से कम नैपी भिगोई हैं, तो उसमें जल की कमी होने का ख़तरा है। ऐसी स्थिति में आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए।

पेट फूलना -

कई बच्‍चों का पेट थोड़ा-बहुत फूला रहता है, विशेषकर अधिक खाना खाने के बाद, लेकिन यह दो आहारों के बीच मुलायम महसूस होना चाहिए, विशेषकर जब बच्‍चा सो रहा हो। यदि उसका पेट निरंतर फूला हुआ और कठोर महसूस हो रहा है और साथ ही उसने एक दिन अथवा अधिक समय से मलत्‍याग नहीं किया अथवा पेट की गैस नहीं निकली है अथवा वह बार-बार उल्‍टी कर रहा है, तो आपको उसे तत्‍काल डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए, क्‍योंकि यह आंतों से संबंधित गंभीर समस्‍या हो सकती है।

बुखार-

जब कभी भी आपका बच्‍चा असामान्‍य तौर पर चिड़चिड़ा अथवा गर्म महसूस हो, तो उसका तापमान मापें। कांख का तापमान मापना ज्‍यादा सुरक्षित विकल्‍प है और 3 माह से कम आयु के बच्‍चों के लिए ऐसा करने की विशेष सलाह दी जाती है। यदि कांख का तापमान 37.3℃ / 99.1℉ से अधिक है अथवा कान का तापमान 100.4℉ से अधिक है, तो आपको उसे डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए, क्‍योंकि यह संक्रमण का लक्षण हो सकता है। जल्‍दी चिकित्‍सीय सहायता मुहैया करना आवश्‍यक है, क्‍योंकि छोटे बच्‍चों की स्थिति बहुत जल्‍दी ख़राब हो सकती है।

निम्‍नलिखित स्थिति में अपने बच्‍चे को तत्‍काल डॉक्टर के पास लेकर जाएं-

पीला, उनींदा दिखाई देने पर और गर्म महसूस होने परसुस्‍त होने पर अथवा बहुत अधिक रोने परहरी अथवा रक्‍तयुक्‍त तरल की उल्‍टी करने परबिल्‍कुल आहार न लेने पर
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3. बच्चों में वायरल इनफेक्शन की समस्या


** बच्चों में वायरल इनफेक्शन की  समस्या **


गैलरी फोटो 
वायरल इनफेक्शन क्या है?
मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे बच्चे को वायरल बुखार है?
मैं अपने बच्चे को वायरल बुखार से कैसे बचा सकती हूं?
मैं अपने शिशु को स्वस्थ होने मे कैसे मदद  कर सकती हूं?अगर शिशु को वायरल बुखार है, तो कौन से गंभीर संकेतों पर मुझे ध्यान देना चाहिए?
विषाणुजनित संक्रमण और जीवाणुजनित संक्रमण में क्या अंतर है?

वायरल इनफेक्शन क्या है?

वायरल इनफेक्शन यानि विषाणुजनित संक्रमण विषाणुओं (वायरस) की वजह से होते हैं।

वहीं, जीवाणुजनित संक्रमण यानि बैक्टीरियल इनफेक्शन का कारण जीवाणु (बैक्टीरिया) होते हैं और ऐसे संक्रमणों का उपचार एंटीबायटिक दवाओं से किए जाने की जरुरत होती है।

सबसे आम वायरल बुखार मौसमी फ्लू या इनफ्लूएंजा होता है। मगर बच्चे आसानी से हल्के वायरल इनफेक्शन की चपेट में भी आ सकते हैं।

बहुत से अलग-अलग तरह के विषाणु हैं, जो आपके शिशु को बीमार बना सकते हैं। ये संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलते हैं। ये विषाणु शारीरिक संपर्क से भी फैल सकते हैं, जैसे कि विषाणु संक्रमित हाथों के जरिये।

जब वायरल संक्रमण काफी आम होते हैं, जैसे कि मौसमी बदलाव के दिनों में, तो उस दौरान ये विषाणु वायु संचार प्रणाली (एयर वेंटिलेशन सिस्टम) के जरिये भी फैल सकते हैं।

बच्चों में वायरल बुखार के लक्षण दिखने के बाद 10 दिनों तक यह संक्रमण काफी संक्रामक हो सकता है। हालांकि, कुछ लक्षण दो हफ्तों तक भी जारी रह सकते हैं। दो साल से कम उम्र के बच्चों में वायरल बुखार से जुड़ी जटिलताएं पैदा होने का खतरा ज्यादा रहता है। 

वायरल बुखार कई तरह के होते हैं। यदि शिशु को वायरल फ्लू (इनफ्लूएंजा) होता है, तो इसका उपचार न कराने पर यह निमोनिया जैसी जटिलताओं का कारण बन सकता है।

वायरल बुखारों या वायरल फ्लू के उपचार में सिर्फ बुखार, खांसी और जुकाम के लक्षणों को नियंत्रित करना होता है। ऐसी कोई दवा नहीं है, जो वायरल संक्रमण को ठीक कर सके। मगर, लक्षणों के अनुसार यह उपचार आपके शिशु को राहत देने में मदद कर सकता है। शिशु को अगर फ्लू (इनफ्लूएंजा) है, तो यह उपचार इसे आगे किसी जटिलता में तब्दील होने से रोकता है।

मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे बच्चे को वायरल बुखार है?

आमतौर पर वायरल बुखार का पहला लक्षण ठंड लगना होता है। 100 से 103 डिग्री फेरन्हाइट बुखारहोना ए​क अन्य शुरुआती लक्षण है। वायरल बुखार से संक्रमित बच्चे को अक्सर पूरे शरीर में दर्द होता है, खासकर कि पीठ और टांगों में। वायरल संक्रमण अलग-अलग प्रकार के होते हैं और लक्षण भी शायद इस बात पर निर्भर करेंगे कि आपके शिशु को कौन से विषाणु से संक्रमण हुआ है। उसे निम्नांकित में से कोई एक या इससे ज्यादा लक्षण भी हो सकते हैं:
खांसीजुकामगले में दर्दनाक बहना या नाक बंद होनासिरदर्दठंठ लगना या ठिठुरन होनाथकानमिचलीउल्टीदस्त (डायरिया)पेट में दर्द

मैं अपने बच्चे को वायरल बुखार से कैसे बचा सकती हूं?

अगर आपके बच्चे की उम्र छह महीने से लेकर दो साल के बीच है, तो आप उसे फ्लू के खिलाफ प्रतिरक्षा के लिए सालाना टीका लगवा सकती हैं। इस बारे में अपने डॉक्टर से पूछें। यह टीका शिशु को कुछ सबसे आम विषाणुओं के खिलाफ प्रतिरक्षित करेगा और किसी भी जटिलता को होने से रोकेगा 
यह बात ध्यान रखें कि फ्लू के टीके में केवल दो या तीन तरह के विषाणु ही होते हैं। इसलिए यह आपके शिशु को केवल इन्हीं दो या तीन विषाणुओं से सुरक्षित करता है। आपके शिशु को अब भी किसी दूसरे विषाणु से वायरल फ्लू हो सकता है।

बहरहाल, यह टीका हर साल बनाया जाता है, ताकि यह उस साल फैल रहे सबसे आम विषाणुओं के खिलाफ शिशु को प्रति​रक्षित कर सके। इसीलिए यह एक ऐसा टीका है, जिसे हर साल लगवाने की जरुरत होती है।

आप निम्नांकित बातें ध्यान में रखें:

अपने बच्चे को बीमार व्यक्ति से दूर रखने का प्रयास करें। सभी को खांसते या छींकते समय टिशू के इस्तेमाल के लिए कहें। इससे रोगाणुओं को फैलने से रोका जा सकता है। अगर, परिवार के किसी सदस्य या फिर कामवाली को दस्त (डायरिया) या उल्टी है, तो सुनिश्चित करें कि वे साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दें।अपने और बच्चे के हाथ अक्सर साबुन से धोती रहें, ताकि विषाणु की चपेट में आने से बचें।मौसम में बदलाव के दौरान वायरल संक्रमण सबसे आम होते हैं, इसलिए साल के ऐसे समय विशेष ध्यान रखें।

मैं अपने शिशु को स्वस्थ होने मे कैसे मदद  कर सकती हूं?

पर्याप्त पेय पदार्थ दें-
बुखार, दस्त, उल्टी या सर्दी-जुकाम के दौरान बच्चे में पानी की कमी हो जाती है। अगर आप अभी भी शिशु को स्तनपान कराती हैं, तो उसे अपनी मर्जी के अनुसार स्तनपान करने दें। आप क्लिनिक या अस्पताल से ओआरएस (ओरल रीहाइड्रेशन साल्ट्स) का घोल भी ला सकती हैं। यह आपके बच्चे को वे सभी पोषक तत्व प्रदान करेगा, जो उसने संक्रमण के दौरान खोए हैं। अगर, आपका शिशु केवल स्तनपान ही करता है, तो भी आप उसे ओआरएस का घोल दे सकती हैं।


विशेष भोजन
अगर आपके शिशु की उम्र छह महीने से ज्यादा है, तो उसे मुलायम, पतले भोजन जैसे की सूप, दाल और चीनी मिला दही दें। जैसे-जैसे शिशु थोड़ा ठीक होने लगे, तो उसे गाढ़े भोजन जैसे कि मसली हुई सब्जियां, खिचड़ी या दलिया देना शुरु कर सकती हैं। यहां और अधिक पढ़ें कि खांसी और बुखार से पीड़ित बच्चे को कैसा भोजन दिया जाए।

दवाई
अपने बच्चे को क्लिनिक या अस्पताल ले जाएं। डॉक्टर आपको जिंक टैब्लेट और यदि शिशु को दस्त हैं, तो ओआरएस दे सकते हैं। शिशु का बुखार कम करने के लिए वे आपको विशेष दर्द निवारक दवा भी दे सकते हैं।

घर में आराम
बच्चे को घर में एक अलग कमरे में शांति से आराम करने दें। संक्रमण के दौरान और इसके खत्म होने के कम से कम एक हफ्ते बाद तक उसे पूरा आराम करना चाहिए। यह उसे बीमारी से लड़ने और ठीक होने मे मदद करेगा। इससे वह परिवार के अन्य सदस्यों या बच्चों को संक्रमित करने से भी बचेगा।

बुखार कम करने का प्रयास करें
अगर आपके बच्चे को तेज बुखार है, तो आप हल्के गर्म पानी से उसका शरीर पौंछ सकती हैं। यह उसे तरोताजा बनाएगा और तापमान कम करने में भी मदद करेगा। बुखार कम करने के कुछ गैर चिकित्सकीय उपायों के बारे में यहां पढ़ें।

अपने हाथ धोएं
बच्चे को छूने से पहले और बाद में आप अपने हाथ अवश्य धोएं। इस तरह संक्रमण परिवार के अन्य सदस्यों तक फैलने से रोका जा सकता है।

उपचार
यदि आपके शिशु की तबियत अभी भी ठीक न लगे, तो डॉक्टर के पास जाएं। उनसे पूछें कि क्या कोई एंटीवायरल दवाई शिशु को दी जा सकती है।

घर की हवा बाहर निकलने दें
दिन में कम से कम एक बार खिड़कियां व दरवाजें खोलें, ताकि ताजी हवा अंदर आ सके। इससे हवा में फैले रोगाणुओं को हटाने में मदद मिलती है। अपने घर को हवादार, सूखा और साफ रखने से फफूंदी के संक्रमण को भी रोका जा सकता है। यहां पढ़ें कि अपने घर को फफूंदी मुक्त रखने के लिए आप क्या कर सकती हैं।

अगर शिशु को वायरल बुखार है, तो कौन से गंभीर संकेतों पर मुझे ध्यान देना चाहिए?

वायरल बुखार आमतौर पर गंभीर नहीं होता है, और सही उपचार से ठीक हो जाना चाहिए। मगर, यदि आपके शिशु में निम्नांकित कोई भी लक्षण दिखें, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं:
तीन हफ्तों से ज्यादा खांसीदो हफ्तों से ज्यादा दस्तमल में खून आनाएक हफ्ते या इससे ज्यादा देर बुखारदौरे पड़नाकुछ भी खाने-पीने से इंकारलगातार उल्टीसांस लेने में तकलीफअसामान्य उनींदापनदोनों पैरों में सूजन

विषाणुजनित संक्रमण और जीवाणुजनित संक्रमण में क्या अंतर है?

विषाणुजनित (वायरल) और जीवाणुजनित (बैक्टीरियल) दोनों ही संक्रमणों की वजह से बुखार, ठंड लगना और बेचैनी रहती है। इन दोनों में अंतर बताना मुश्किल हो सकता है। 

जीवाणुजनित संक्रमण में शरीर के किसी एक हिस्से में लाली, ताप, सूजन और दर्द रहता है। इसलिए, यदि आपके शिशु को जीवाणु की वजह से गले में दर्द है, तो उसे गले के एक हिस्से में ज्यादा दर्द होगा। जीवाणुजनित संक्रमण का उपचार सामान्यत: एक विशेष एंटीबायटिक से किया जाता है, जो केवल बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु को मारता है।

वहीं दूसरी तरफ, विषाणुजनित संक्रमण में एक ही समय में शरीर के विभिन्न हिस्से चपेट में आते हैं। इसलिए, अगर आपके बच्चे को यह संक्रमण है, तो उसे खांसी, नाक बहना और शरीर में दर्द एक साथ हो सकता है।

विषाणुजनित संक्रमण जैसे कि जुकाम या फ्लू पर एंटीबायटिक्स का कोई असर नहीं होता। एंटीबायटिक्स दवाएं केवल ऐसे जीवाणुजनित संक्रमणों के लिए लें, जो अपने आप ठीक नहीं हो पा रहे हों।

विषाणुजनित संक्रमण के उपचार में सामान्यत: खूब सारा पानी और तरल पदार्थ पीना, आराम करना और दर्द निवारक व बुखार कम करने की दवा लेना शामिल है। 

अधिकांश विषाणुजनित संक्रमणों जैसे कि फ्लू, से लड़ने के लिए टीके होते हैं। वे विषाणु से जल्दी और प्रभावी तरीके से निपटने में शरीर की मदद कर सकते हैं।