Wednesday, 1 November 2017

9. बच्चो की नार्मल डिलेवरी कैसे होती है?

बच्चो की नार्मल डिलेवरी

क्योंकि मनुष्य एक द्विपाद और सीधी मुद्रा वाला प्राणी है, और श्रोणी के आकार के हिसाब से, स्तनधारी प्राणियों में मनुष्य का सर सबसे बड़ा होता है, महिलाओं के श्रोणी और मनुष्य के भ्रूण को इस तरह से बनाया गया है की जन्म संभव हो सके.

महिला की सीधी मुद्रा उसके पेट के अंगों का वजन उसके श्रोणी के तल पर डालती है, जो की एक बड़ी जटिल संरचना होती है और जिसे ना सिर्फ वजन सहना होता है बल्कि तीन वाहिकाओं को भी अपने अन्दर से बाहर जाने का रास्ता देना होता है: मूत्रमार्ग, योनि और मलाशय.अपेक्षाकृत बड़े सिर और कन्धों को श्रोणी की हड्डी से निकलने के लिए गतिशीलता का एक विशेष अनुक्रम अपनाना पड़ता है। इस गतिशीलता में किसी भी तरह की विफलता होने पर अधिक लम्बी और दर्दनाक प्रसव पीड़ा होती है और यहाँ तक की इस वजह से प्रसव रुक तक सकता है। गर्भाशय ग्रीवा के कोमल उतकों और जन्म नलिका में सभी परिवर्तन इन छह चरणों के सफल समापन पर निर्भर करते हैं:

भ्रूण के सिर का अनुप्रस्थ स्थिति में आ कर लगना. बच्चे का सिर श्रोणि के आर पार मुंह करता हुआ माता के कूल्हों पर लगा होता है।भ्रूण के सिर का उतरना और उसका आकुंचन होना.आंतरिक घूर्णन. भ्रूण का सिर ओकीपिटो हड्डी के आगे के हिस्से में 90 डिग्री पर घूमता है ताकि बच्चे का चेहरा माता के मलाशय की ओर हो.विस्तार के द्वारा डिलिवरी. भ्रूण का सिर जन्म नलिका के बाहर आता है। इसका सिर पीछे की ओर झुका होता है ताकि उसका माथा योनि के माध्यम से बाहर का रास्ता बनाता है।प्रत्यास्थापन. भ्रूण का सिर 45 डिग्री के कोण पर घूमता है ताकि यह कन्धों के साथ सामान्य स्थिति में आ जाए, जो अभी तक एक कोण पर टिके होते हैं।बाहरी घूर्णन. कंधे सिर की सर्पिल गति की आवृत्ति करते हैं, जो भ्रूण के सिर की अंतिम चाल में दिखता है।

जैसे जैसे भ्रूण का सिर जन्म नलिका से बाहर निकलता है, वह अस्थायी रूप से अपना आकार बदलता है (अधिक लंबा हो जाता है).भ्रूण के सिर के आकार के इस परिवर्तन को मोल्डिंग कहा जाता है और यह उन महिलाओं में साफ़ तौर पर दिखता है जिनकी पहली बार योनिमार्ग द्वारा प्रसूती हो रही होती है।

सुप्त चरण ÷ 

प्रसव का सुप्त चरण, जिसे प्रोडरमल लेबर भी कहते हैं, कई दिनों तक चल सकता है और इस चरण में जो संकुचन होते है वे ब्रेक्सटन हिक्स संकुचन जो कि गर्भावस्था के 26वें सप्ताह से प्रारम्भ होते हैं से अधिक गहन होते हैं। ग्रीवा विलोपन गर्भावस्था के अंतिम सप्ताहों के दौरान होता है और आमतौर पर सुप्त चरण के पूरा होने तक या तो समाप्त हो चुका होता है या समाप्त होने वाला होता है। ग्रीवा विलोपन या गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव से आशय है गर्भाशय ग्रीवा का पतला होना या फैलना.योनि परीक्षा के दौरान ग्रीवा विलोपन किस हद तक हुआ है यह महसूस किया जा सकता है। एक 'लंबी' गर्भाशय ग्रीवा का तात्पर्य है कि नीचे वाले हिस्से में बच्चा नहीं जा पाया है और छोटी ग्रीवा होने का अर्थ इसके विपरीत होता है। सुप्त चरण का अंत सक्रिय चरण की शुरुआत से होता है, जब गर्भाशय ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है।

पहला चरण: फैलाव

प्रसव पीड़ा सहती हुई माता की प्रगति का आकलन करने के लिए कई कारक होते हैं जिनका उपयोग दाइयां और चिकित्सक करते हैं और इन कारको को हम बिशप स्कोर से परिभाषित करते हैं। बिशप स्कोर का प्रयोग यह भविष्यवाणी करने के लिए भी किया जाता है की माता स्वयं ही स्वाभाविक रूप से दूसरे चरण (प्रसूती) में प्रवेश कर पाएगी या नहीं.

प्रसव का पहला चरण तब शुरू होता है जब विलोपित ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है। इस स्थिति में कुछ विभिन्नता हो सकती है क्योंकी इस स्थिति में पहुँचने से पहले भी कुछ महिलाओं में सक्रिय संकुचन की शुरुआत हो जाती है। वास्तविक प्रसव की शुरुआत तब मानते हैं जब गर्भाशय ग्रीवा धीरे धीरे फैलने लगती है। झिल्ली का टूटना, या रक्त के धब्बे का दिखना जिसे 'शो' कहते हैं वह इस चरण में अथवा इसके आसपास घटित हो भी सकता है और नहीं भी.

गर्भाशय की मांसपेशियां गर्भाशय के उपरी क्षेत्र से उस स्थान तक जहां पर गर्भाशय का निचला क्षेत्र जुड़ता है सर्पिल गति में घूमती है। विलोपन के दौरान, गर्भाशय ग्रीवा गर्भाशय के निचले हिस्से में शामिल हो जाती है। एक संकुचन के दौरान, ये मांसपेशियां सिकुडती हैं और बच्चे को निष्कासित करने के उद्देश्य से जो गतिविधि होती है उससे ऊपरी हिस्सा छोटा हो जाता है और निचला हिस्सा ऊपर को आता है। इससे ग्रीवा खिंच कर बच्चे के सर के ऊपर आ जाती है। पूरा फैलाव तब माना जाता है जब ग्रीवा का मुंह इतना चौड़ा हो जाता है की वह एक पूर्ण विकसित बच्चे का सर बाहर निकाल सके, जो की तकरीबन 10 सेमी होता है।

प्रसव काल की अवधि में अलग अलग महिलाओं में काफी अंतर पाया जाता है, परन्तु उन महिलाओं में जो पहली बार बच्चे को जन्म दे रही होती हैं, सक्रिय चरण औसतन आठ घंटे का होता है और चार घंटे का उन महिलाओं में होता है जो पहले भी जन्म दे चुकी होती हैं। पहली बार बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं में सक्रिय चरण का रुकना तब माना जाता है जब उनकी गर्भाशय ग्रीवा कम से कम दो घंटे में भी 1.2 सेमी प्रति घंटे की दर से भी नहीं फैलती है। यह परिभाषा फ्रीडमैन कर्व पर आधारित है, जो की सक्रिय प्रसव के दौरान ग्रीवा के फैलाव की आदर्श दर और भ्रूण के बाहर निकलने को ग्राफ की सहायता से मापती है।कुछ चिकित्सक "प्रसव की प्रगति में विफलता" बता कर, अनावश्यक रूप से सिजेरियन ऑपरेशन करते हैं। हालांकि, जैसा की किसी भी प्रथम रोग निदान के साथ होता है, ऐसा करने को गंभीर रूप से हतोत्साहित किया जाता है क्योंकी इसमें अतिरिक्त खर्चा होता है और घाव ठीक होने में काफी समय लगता है।


दूसरा चरण: भ्रूण निष्कासन

इस चरण का प्रारम्भ तब होता है जब गर्भाशय ग्रीवा पूरी तरह फैल जाती है और तब समाप्त होता है जब अंततः बच्चे का जन्म हो जाता है। जैसे जैसे गर्भाशय ग्रीवा पर दबाव बढ़ता है, फर्ग्यूसन रिफ्लेक्सगर्भाशय के संकुचन बढ़ा देता है ताकि दूसरा चरण आगे बढ़ सके.सामान्य दूसरे चरण की शुरुआत में, सिर पूरी तरह से श्रोणि में लग जाता है; और सिर का सबसे चौड़ा व्यास श्रोणि के किनारे से निकल चुका होता है।

आदर्श रूप में इसे सफलतापूर्वक (interspinous) इंटरस्पाइनस व्यास के नीचे आ जाना चाहिए.यह श्रोणि का सबसे संकरा हिस्सा होता है। यदि ये गतिविधियाँ पूरी हो जाती हैं तो, भ्रूण के सिर का श्रोणि चाप से बाहर निकलना और योनि के द्वार से बाहर निकलना रह जाता है। इस कार्य में माता के "नीचे धकेलने के प्रयास" या धक्का देने का प्रयास भी सहायता करते हैं। लेबिया के अलग होने पर भ्रूण का सिर दिखने लग जाता है जिसे "क्राउन" कहते हैं। इस बिंदु पर औरत को जलने का या चुभने का एहसास हो सकता है।

भ्रूण के सिर का जन्म प्रसव की चौथी प्रक्रिया के सफलतापूर्वक समाप्त होने का संकेत होता है (विस्तार द्वारा प्रसव और इसके बाद पांचवी और छठी प्रक्रिया (प्रत्यास्थापन और बाहरी घूर्णन) अपना स्थान लेती हैं।
नाभि रज्जु के साथ एक नवजात शिशु जिसकी नाभि रज्जु को अब बाँधना है।

प्रसव के दूसरे चरण में कुछ हद तक विभिन्नता हो सकती है और यह इस पर निर्भर करता है की पिछले कार्य कितनी सफलता से पूरे हुए हैं।

तीसरा चरण: नाभि रज्जु का बंद होना और गर्भनाल का निष्कासन

प्रसव के तीसरे चरण के दौरान और उसके बाद स्तनपान, नाभि रज्जु योनी में से दिखने लग जाती है।

भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से ले कर नाभि रज्जु के निकलने तक का काल प्रसव का तीसरा चरण कहलाता है।

इस अवस्था में नाभि रज्जु को बांधा जाता है और काटा जाता है, परन्तु अगर इसे बांधा ना भी जाए तो भी यह स्वाभाविक रूप से बंद हो जाती है। 2008 में हुई एक कोचरेन समीक्षा ने नाभि रज्जु को बाँधने के समय को देखा. यह पाया गया कि नाभि रज्जु को बाँधने के समय से माता की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु बच्चे की स्थिति में फर्क पड़ता है। यदि नाभि रज्जु को जन्म के 2-3 मिनट के बाद बांधा जाता है, तो शिशु को अपने जीवन के पहले महीने में हीमोग्लोबिन की बढ़ी हुई मात्रा मिलती है, परन्तु साथ ही बच्चे को पीलिया के कारण फोटोथेरेपी देने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। कभी कभी एक नवजात शिशु का जिगर माता के गर्भ में प्राप्त हुई सभी लाल कणिकाओं को तोड़ नहीं पाता, विशेषकर तब जब नाभि रज्जु बाँधने में देरी के कारण शिशु को अधिक मात्रा में रक्त मिल जाता है और ऐसी स्थिति में फोटोथेरेपी रक्त कणिकाओं को तोड़ने में सहायता करती है।

नाभि रज्जु का निष्कासन गर्भाशय की दीवार से शारीरिक रूप से टूट कर होता है। भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से नाभि रज्जु के निकलने तक के काल को प्रसव का तीसरा चरण कहते हैं। सामान्यतः बच्चे के जन्म के 15-30 मिनट के भीतर नाभि रज्जु बाहर निकाल दी जाती है। नाभि रज्जु निष्कासन को सक्रिय रूप से सम्भाला जा सकता है, उदाहरण के लिए इंट्रामसकुलर इंजेक्शन द्वारा ऑक्सीटोसिनदे कर नाभि रज्जु हाथ से खींच कर निकाल ली जाती है ताकि नाभि रज्जु के बाहर आने में सहायता की जा सके. इसके अतिरिक्त वैकल्पिक रूप से, यह थोडा इंतज़ार कर के भी निकाली जा सकती है, जिसमें नाभि रज्जु को बगैर किसी चिकित्सकीय सहायता के स्वतः ही बाहर आने दिया जाता है। एक कोचरेन डेटाबेस  अध्ययन के अनुसार खून का बहना और प्रसव पश्चात खून बहने के खतरे को उन महिलाओं में घटाया जा सकता है जिनके प्रसव के तीसरे चरण के लिए सक्रीय प्रबंधन क़ी व्यवस्था के गई होती है।


जब प्रसव के दौरान अथवा धक्का देने के दौरान अम्निओटिक थैली नहीं फटती है, तो बच्चा साबुत झिल्ली के साथ भी पैदा हो सकता है। इस तरह से जन्म लेने क़ी घटना को "कॉल (शीर्षावरण) में जन्म लेना" कहते हैं। कॉल हानिरहित होता है और उसकी झिल्ली आसानी से टूट जाती है और साफ़ क़ी जा सकती है। आधुनिक सुधारात्मक (interventive) प्रसूति विज्ञान के आगमन के साथ, कृत्रिम रूप से झिल्ली को तोड़ना आम हो गया है, अतः बच्चे शायद ही कभी कॉल में पैदा होते हैं।

चौथा चरण

"प्रसव का चौथा चरण" एक ऐसा शब्द है जो दो अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है:

इसका तात्पर्य प्रसव के तुरंत बाद से हो सकता है, अथवा नाभि रज्जु के निकल आने के तुरंत बाद वाले घंटों से भी हो सकता है।प्रसव के बाद के हफ़्तों के लिए भी लाक्षणिक रूप से इसका प्रयोग हो सकता है।

बच्चे के जन्म के बाद

कई संस्कृतियों में बच्चों के जीवन क़ी शुरुआत के साथ रिवाज जुड़े हुए हैं, जैसे नामकरण संस्कार, दीक्षा संस्कार और अन्य.

माताओं को अक्सर एक अवधि ऐसी मिलती है जब वे अपने सामान्य काम से मुक्त होकर बच्चे के जन्म के बाद स्वास्थ्यलाभ अर्जित करती हैं। यह अवधि भिन्न भिन्न हो सकती है। कई देशों में, नवजात शिशु क़ी देखभाल के लिए काम से छुट्टी लेने को "मातृत्व अवकाश" या "पैरंटल अवकाश" कहा जाता है और यह अलग अलग जगहों पर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों के बीच हो सकता है।

अन्तिम चरण

स्टेशन से तात्पर्य है भ्रूण के बाहर निकलने वाले भाग का इशीअल स्पाइन से सम्बन्ध. जब बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग इशीअल स्पाइन पर होता है तब स्टेशन शून्य माना जाता है। अगर बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग स्पाइन के ऊपर होता है, तब इस दूरी को माइनस स्टेशंस में मापा और बताया जाता है, जो -1 से -4 सेमी के बीच हो सकता है। अगर पेश भाग इशीअल स्पाइन से नीचे होता है, तब इस दूरी को प्लस स्टेशन में बताते हैं (+1 से +4 सेमी). +3 और +4 पर बच्चे का पेश भाग मूलाधार पर होता है और देखा जा सकता है।
http://Babycaresaroj.blogspot.in

https://www.youtube.com/channel/UCvhlWPVRurKJ0-Sdj0qfFQg



1 comment:

  1. Casino | Dr. MSN
    Casino · Hotel 사천 출장마사지 · Casino. Dr. MSN · Casino. Dr. 평택 출장샵 MSN. Dr. 여주 출장안마 MSN. 전주 출장안마 Dr. MSN. 광명 출장샵 Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr. MSN. Dr.

    ReplyDelete