Thursday, 26 October 2017

4. जानिये नवजात शिशु की कैसे करें देखभाल

** जानिये नवजात शिशु की कैसे करें देखभाल **

फोटो गैलरी १ 

          नौ महीने तक कोख में पालने और असहनीय प्रसव पीड़ा के बाद जब आपके गोद में बच्चे की किलकारियां गूंजती है तो आपकी खुशी दोगुनी हो जाती है। मगर इस खुशी के साथ आपकी जिम्मेवारियां भी बढ़ जाती है। मां बनने की जिम्मेवारी पहली बार मां बनने के समय आपको यह पता नहीं होता है कि बच्चे की देखभाल कैसे करें। कैसे उसे गोद में लें, कैसे उसे दूध पिलाएं, कैसे उसे नहलाएं...।
      ऐसी कई जिम्मेवारियां है जो माता-पिता को बच्चे के जन्म से लोकर पांच साल तक काफी सावधानी और समझदारी से उठानी पड़ती है। मगर आप घबराएं नहीं, हम आपको बताने जा रहें हैं नवजात के देखभाल के सबसे आसान और सुरक्षित तरीके।


  • जानें कैसे उठाएं नवजात शिशु  को गोद में 



हो सकता है कि आप अपने कोमल और नाजुक बच्चे को गोद में उठाने से पहले डर से सिहर जाए। आपको डर लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ी हो जाए तो...। मगर डरे नहीं। बस कुछ ऐसे बेसिक तकनीक को आजमाएं और आराम से बच्चे को गोद में उठाएं और उसे लाड़-प्यार करें। नवजात शिशु को गोद में उठाने से पहले हाथ को एंटी-सेप्टिक सेनेटाइजर लिक्विड से अच्छी तरह धो लें ताकि बच्चे को कोई संक्रमण का खतरा न हो। बच्चों की रोग प्रतिरोधी क्षमता उतनी मजबूत नहीं होती है और वो बहुत जल्दी संक्रमण का शिकार हो जाते हैं।

बच्चे को उठाते समय उसके सिर और गर्दन को ठीक से पकड़े रहें, जैसे उनको सपोर्ट दे रहे हों। एक हाथ सिर और गर्दन के नीचे और एक हाथ पैर के नीचे रखें और फिर पालने के झूले की तरह बच्चे को सपोर्ट दें।बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि वो झूले पर झूल रहा है। बच्चे को पालने की तरह हल्का उपर और नीचे झुलाएं। ध्यान रहे नवजात को ज्यादा उपर या नीचे ना झुलाएं। यह खतरनाक हो सकता है। ना ही बच्चे का सिर ज्यादा हिलाएं। इससे SIDS ) का भी खतरा रहता है।नवजात को कभी भी जोर से झकझोरें या हिलाए नहीं, चाहे आप उससे खेल में ठिठोली कर रहे हों या गुस्से में ही क्यों न हो। इससे बच्चे के सिर में खून रिसने लगेगा और मौत भी हो सकती है। कभी भी नवजात को सोते समय झकझोड़ कर नहीं उठाए। इससे बेहतर है कि उसके पैर में हल्की चिकोटी काटे या सहलाएं या फिर गालों को सहलाएं।
याद रहें नवजात को हमेशा नर्म और मखमली स्पर्श ही करें।नवजात को नर्म और गर्म कपड़े में लपेट कर रखने के लिए सीखें। इससे बच्चा काफी सुरक्षित महसूस करता है। 0-2 महीने तक शिशु को जरुर लपेटकर रखें। इससे बच्चे को वातावरण के बदलाव का ज्यादा असर नहीं पड़ता है।


जाने नवजात को पकड़ने और संभालने का तरीका 



नवजात को गोद में लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपके हाथ के नीचे बच्चे का सिर और गर्दन सही तरीके से है कि नहीं। जब-जब बच्चे को गोद में लेने के लिए उठाएं तो सिर और गर्दन को जितना सपोर्ट मिलेगा उतना अच्छा रहेगा। गोद में बच्चे के सिर को अपने कोहनी के नीचे आराम करने दे औप पूरे शरीर को अपने बांह पर। जब तक बच्चा गोद में रहे उसके मूवमेंट पर पूरा ध्यान बनाकर रखें।

जाने बच्चे को आराम करने और सुलाने का तरीका 

नवजात के सेहत के लिए तीन महीने तक काफी आराम की जरुरत होती है। इस दौरान बच्चे 16 से 20 घंटा तक सो (आराम कर) सकते हैं। तीन महीने के बाद बच्चे 6 से 8 घंटे तक सोते हैं।बच्चे सो रहे हैं या आराम कर रहे हैं तो उन्हें हर चार घंटे पर स्तनपान कराना न भूलें। रात में भी बच्चे तीन महीने तक 6 से 8 घंटे तक पूरी रात सोते हैं। अगर रात में बच्चे ठीक से मतलब 2 से 3 घंटे भी नहीं सो पा रहे हैं तो यह चिंता का विषय है।बच्चे जिस तकिया पर सो रहा है/ रही है वो काफी हल्का और नर्म होना चाहिए, और तकिया पर एक ही जगह बच्चे का सिर ज्यादा देर तक नहीं रहना चाहिए, ऐसा रहने से सिर का आकार गड़बड़ा सकता है और SIDS का खतरा हो सकता है। बच्चे के सिर के पोजीशन को तकिया पर बदलते रहे। पहले दाएं, फिर बाएं और फिर बीच में।नवजात को दिन और रात का अनुभव नहीं होता है। कभी-कभी कोई-कोई बच्चा रात को ज्यादा अलर्ट हो जाता है, जगा रहता है और पूरे दिन सोता रहता है। ऐसी स्थिति में रात में बच्चे के कमरे में नीम अंधेरा कर दें। दिन में हो सके तो बच्चे को थपथपा कर जगाएं और उसके साथ खेलें और बातचीत करें ताकि रात को वो सही से सो सके।

जाने कैसे कराएं स्तनपान-
फोटो गैलरी २ 

          मां का दूध एक संपूर्ण और संतुलित आहार है। नवजात शिशुओं को उनके शुरुआती छह महीने में केवल मां के दूध की ही जरुरत होती है। यह शिशु को सभी जरुरी पोषक तत्व प्रदान करता है। अगर आपको दूध आता है तो अपने शिशु को 6 महीने तक जरुर स्तनपान कराएं।
         प्रसव के तुरंत बाद मां का दूध पीलेपन वाला और गाढ़ा होता है। इस दूध को कोलोस्ट्रम(गाढ़ा दूध या खीस) कहते हैं। कोलस्ट्रम परिपक्व दूध (मेच्योर मिल्क) से अधिक पोषक होता है, क्योंकि इसमें अधिक प्रोटीन, संक्रमण से लड़ने वाली अधिक खूबियां होती है। यह आपके शिशु को संक्रमण से होने वाली खतरनाक बीमारी से बचाती है। इसमें विटामिन ए की भी मात्रा अधिक होती है।स्तनपान के लिए शिशु और मां का सही पोस्चर होना जरुरी है। दोनों बाजु में शिशु को उठा कर उसके पूरे शरीर को अपनी और करें। शिशु के उपरी होंठ में अपने स्तन के निपल को सटाएं और जब शिशु अपना पुरा मुंह खोल दे तो अपने स्तन के निपल को अंदर कर दें। आपका शिशु जब जाहे उसे अपने स्तन का निपल चूसने दें।
         स्तनपान कराने के बाद रोजाना नहाते समय साफ पानी से स्तनों को धोएं। दूध पिलाने के बाद स्तनों को साफ कपड़े से पोछें या दोबारा कपड़े से ढ़कने से पहले उन्हें स्वाभाविक रुप से सूखने दें।अगर आप शिशु को स्तनपान करा रहीं हैं तो ध्यान रहे इसके स्थान पर चीनी घुला पानी, शहद घुला पानी या अन्य कुछ उल्टी-सीधी चीजें कभी न दें।  अगर आपका शिशु काफी देर तक स्तनपान कर रहा है तो वो पूरे दिन में 6 से 8 बार डायपर गीला कर सकता है। पेट भी गड़बड़ हो सकती है। मगर इससे घबराए नहीं। अगर चार बार से ज्यादा डायपर को गीला करता है तो डॉक्टर के पास जाएं।अगर आप स्तनपान करा रहीं है तो कुछ भी उल्टा-सीधा न खाएं। दाल का सेवन ज्यादा करें और पोषक आहार खाएं। इससे स्तन में दूध भरेगा और गाढ़ा होगा। धूम्रपान और नशा न करें।अगर प्रसव के तुरंत बाद स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो नर्स से संपर्क करें। धैर्य रखें और पोषक आहार का सेवन करते रहें, दो से तीन दिन में स्तन में दूध आने लगेगा।


जानें कैसे कराएं बोतल फीडिंग -


फोटो गैलरी ३ 

अपने शिशु को स्तनपान कराना है या पाउडर के दूध की बोतल फीडिंग करानी है यह फैसला आपका निजी फैसला है। हालांकि जन्म के छह महीने तक बच्चे को मां का दूध ही पिलाना चाहिए। नवजात शिशु के लिए दूध पाउडर का उपयोग करने से पहले यह ध्यान रहे कि इसकी एक खास मात्रा होती है और इसे कैसे बनाना है आदि दूध के डिब्बे पर निर्देश पढ़ने के बाद ही शुरु करें। 

       बोतल फीडिंग से पहले इन बातों का रखें ख्याल बोतल को उबले पानी से धोएं। उबले पानी से साफ नहीं की गई बोतल या गलत मात्रा में दूध का पाउडर मिलाने से बच्चा बीमार हो सकता है।हर तीन घंटे पर शिशु को बोतल फीडिंग कराएं या जब भूख लगे तब।भूल कर भी बोतल में बचे दूध को फ्रीज में न रखें और उसी दूध को दोबारा न पिलाएं, हर बार ताजा बना हुआ दूध ही बच्चे को पिलाएं।शिशु को बोतल फीडिंग हमेशा 45 डिग्री के कोण मे रख कर पिलाएं। ध्यान रहे बोतल खाली होने पर बच्चा हवा तो नहीं चूस रहा है।


जाने शिशु को डायपर पहनाने के तरीके -


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आप डिस्पोजेबल डायपर बच्चों को पहना रही हैं या फिर कपड़े का डायपर, इसकी आपको सही से देखभाल करनी होगी। कब डायपर बदलनी है और साफ-सफाई का कैसे ख्याल रखना है इसके लिए सचेत रहना होगा।
अगर आप कपड़े का डायपर बच्चे को पहना रही है तो ध्यान रहे यह साफ होना चाहिए। कपड़ों के डायपर को गर्म पानी में एंटी सेप्टिक लिक्वड डाल कर साफ करें, ताकि संक्रमण का खतरा न रहे। डायपर पहलाने से पहले जैतून के तेल से बच्चे को मालिश कर दें ताकि कोई स्किन रैशेज नहीं हो। डायपर हर तीन घंटे पर बदलते रहे, ज्यादा गीला होने पर बच्चे को पेशाब के संक्रमण की बीमारी हो सकती है।
डिस्पोजेबल डायपर को भी हर तीन घंटे पर बदलते रहें क्योंकि ज्यादा गीला होने पर बच्चे को पेशाब के संक्रमण की बीमारी हो सकती है। डायपर खोलने के बाद अच्छी तरह से अंदरुनी हिस्से को वाइप्स से पोछ दें। ज्यादा देर तक डायपर पहनने से स्किन पर दाग या रैशेज हो जाए तो मलहम लगाएं।
अगर बच्चे का पेट खराब है तो ध्यान रहे डायपर जितनी जल्दी हो बदलते रहें।


जाने कैसे नहलाएं शिशु को -


शिशु के जन्म लेने के बाद एक हफ्ते तक बच्चे को स्पांज बाथ दें या भींगे कपड़े से बदन पोंछ दें। जैसे ही बच्चे की नाभि-नाल (Umbilical Chord) के घाव सूख जाए बच्चे को हफ्ते में दो या तीन बार नियमित रुप से नहलाया जा सकता है। नाभि-नाल शिशु मां के गर्भ से जब निकलता है तभी ही ले कर आता है। इसे काटा जाता है और इसके घाव को सूखने में समय लगता है।
ध्यान रहे बच्चे को शुरु के छह महीने में ज्यादा ठंडे या गर्म पानी में नहीं नहलाएं। गुनगुना पानी ही बेहतर है।नहलाते समय बच्चे के दोनों कान को हाथ से अच्छी तरह से बंद कर लें ताकि कान में पानी नहीं जाए।बच्चे को नहलाने से पहले उसके कपड़े, तौलिया, डायपर, माइल्ड क्रीम सोप सभी कुछ तैयार रखें। नहलाने के तुरंत बाद बच्चे को सूखे कपड़े में लपेट लें और जल्द ही बदन पोंछ कर कपड़ा पहना दें।अगर आप बच्चे को पहली बार नहला रहीं है तो अपने साथ घर के बुजुर्ग और अनुभवी लोग को साथ रखें।बच्चे को नहलाने के लिए माइल्ड क्रीम सोप या शैंपू ही इस्तेमाल करें ताकि आंख में साबुन के पानी जाने से वो रोए नहीं। .

खतना और नाभि काटने के बाद कैसे करें देखभाल -

खतना के तुरंत बाद शिशु के शिश्न को पेट्रोलियम जेली लगे हुए गॉज से कवर कर दें ताकि घाव डायपर में सटे नहीं और घाव जल्दी सूख जाए। डायपर बदलने के बाद शिश्न के उपरी हिस्से को गर्म पाना से अच्छे से साफ कर दें। शिश्न के उपरी हिस्से का घाव हफ्ता दो हफ्ता के बाद आम तौर पर सूख जाता है, मगर घाव नहीं सूखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
ठीक उसी तरह मां के गर्भ से निकलने के तुरंत बाद जब बच्चे की नाभि-नाल काटी जाती है तो बच्चे के नाभि के पास घाव हो जाती है। नाभि-नाल काटने के तुरंत बाद स्वाब से उसको ढ़ंक देना चाहिए। घाव पर नीली दवाई जीवी पेंट भी लगाई जाती है , जिससे घाव जल्दी सूख जाती है। तीन हफ्ते के बाद घाव सूख जाती है। अगर इसके बाद भी घाव नहीं सूखे तो डॉक्टर से संपर्क करें ।

छोटे बच्‍चों (जन्‍म से 3 माह) के स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल-


          अस्‍पताल से छुट्टी दिए जाने से पहले डॉक्‍टर द्वारा आपके नवजात शिशु की जांच की जानी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह घर जाने के लिए पूरी तरह से स्‍वस्‍थ है। हमारे मैटरनिटी एण्‍ड चाइल्‍ड हैल्‍थ सेंटर में पंजीकरण के पश्‍चात् आपके बच्‍चे की नियमित जांच की व्‍यवस्‍था की जाएगी। इन शुरुआती जांचों का उद्देश्‍य ऐसी जन्‍मजात असामान्‍यताओं का पता लगाना अथवा अन्‍य महत्‍वपूर्ण नवजात अवस्‍थाओं को पता लगाना है, जिनके लिए और अधिक चिकित्‍सीय देखरेख की आवश्‍यकता हो सकती है और साथ ही इनका उद्देश्‍य भविष्‍य में प्रयोग के लिए आपके बच्‍चे की मौजूदा स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति को रिकॉर्ड करना भी है। तथापि, इन शुरुआती जांचों से जन्‍मजात सहित सभी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का पता नहीं लगाया जा सकता और इनमें से कुछ का बाद में पता चल सकता है। हालांकि ऐसा होना आम नहीं है, छोटे बच्‍चे (विशेषकर नवजात शिशु) बीमार हो सकते हैं और उनका स्‍वास्‍थ्‍य तेज़ी से ख़राब हो सकता है। इसलिए यह महत्‍वपूर्ण है कि आप यह जानते हों कि चिकित्‍सीय सहायता जल्‍दी से कब प्राप्‍त की जानी चाहिए।
बच्‍चे के गंभीर रूप से बीमार होने के संकेत निम्‍नलिखित हैं,जिन पर माता-पिता को ध्‍यान देना चाहिए और उपयुक्‍त कार्रवाई करनी चाहिए:-

सुस्‍ती और उनींदापन-

नवजात शिशु अपना अधिकतर समय सोने में व्‍यतीत करते हैं। तथापि, आपके बच्‍चे को प्रत्‍येक कुछ घंटों के बाद जाग जाना चाहिए, जागने पर अच्‍छी तरह से आहार लेना चाहिए और संतुष्‍ट और सजग दिखाई देना चाहिए। आपको उसकी नियमित दिनचर्या में आने वाले परिवर्तन के बारे में विशेष रूप से सजग रहना चाहिए – ये किसी गंभीर बीमारी के लक्ष्‍ण हो सकते हैं। यदि वह बहुत अधिक थका हुआ अथवा उनींदा नज़र आए, बहुत कम सजग दिखाई दे और आहार लेने के लिए न जागे, तो आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए।

सांस ले‍ने में कठिनाई -


नवजात शिशु को सांस लेने के सामान्‍य तरीके पर स्थिर होने के लिए अर्थात् प्रति मिनट 20-40 सांस लेना शुरू करने के लिए आमतौर पर कुछ घंटे का समय लगता है। अक्सर, जब वह सो रहा होता है तो वह सबसे अधिक नियमित रूप से सांस लेता है। कभी-कभी जब वह जागता है, तो बहुत थोड़ी देर के लिए तेज़ी से सांस ले सकता है और उसके बाद सामान्‍य तरीके पर लौट सकता है।

यदि आपको निम्‍नलिखित में से कुछ नज़र आए, तो आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए:-

लगातार तेज सांस लेना अर्थात्‍ यदि उसकी आयु दो माह से कम है, तो प्रति मिनट साठ से अधिक सांस लेना अथवा यदि उसकी आयु 2-3 माह है, तो प्रति मिनट पचास से अधिक सांस लेनासांस लेने के लिए प्रयास करना पड़ रहा हो और निगलने में कठिनाई हो रही होसांस लेते समय नथुने चौड़े दिखाई देते होंत्‍वचा और होठों का रंग सावला अथवा नीला दिखाई देता हो

रक्‍त संचार संबंधी समस्‍या-

नवजात शिशु को ठंडे वातावरण में ले जाने पर कभी-कभी उसके हाथ और पैर नीले दिखाई दे सकते हैं, लेकिन गर्म वातावरण में आने पर ये वापिस गुलाबी हो जाने चाहिए। कभी-कभार ज़ोर से रोने के लिए अपनी सांस को कुछ क्षण के लिए रोकने पर उसका चेहरा, जीभऔर होंठ थोड़े नीले हो जाने चाहिए। यदि उसके शांत हो जाने पर इनका रंग तेज़ी से सामान्‍य हो जाता है, तो आपको चिंता करनेकी ज़रूरत नहीं है। तथापि, यदि आपका बच्‍चा अचानक और लगातार पीला पड़ रहा है अथवा उसका पूरा शरीर नीला हो जाता है, तो उसे हृदय अथवा फेफड़ों संबंधी समस्‍याएं हो सकती हैं। ऐसे में तत्‍काल चिकित्‍सीय सहायता की आवश्‍यकता होती है।

शरीर में पानी की कमी (हाईड्रेशन) संबंधी अवस्‍था-

शिशुओं में आसानी से और जल्‍दी ही पानी की कमी हो जाती है। सुनिश्चित करें कि आपका बच्‍चा पर्याप्‍त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन कर रहा है, विशेषकर जब वह उल्‍टी कर रहा हो अथवा उसे दस्त लग गए हों। पिछले 24 घंटों में उस द्वारा पीए गए दूध की मात्रा की गणना करें और इसकी उसके सामान्‍य आहार से तुलना करें, जो कि पहले महीने के दौरान प्रतिदिन 10-20 आउंस (300-660 मि.ली.) होती है। यदि आप अपने बच्‍चे को स्‍तनपान करा रही हैं, तो उस द्वारा सक्रिय रूप से स्‍तनपान करने की संख्‍या और अवधि को नोट करें। यदि आप सुनिश्चित नहीं है कि आपका बच्‍चा पर्याप्‍त स्‍तनपान कर रहा है अथवा नहीं, तो आपको प्रसव कराने वाले अस्‍पताल अथवा किसी MCHC से संपर्क करना चाहिए। आप अपने बच्‍चे के पेशाब करने की आवृति और मात्रा को देखकर भी उसकी तरल पदार्थ लेने की मात्रा का पता लगा सकते हैं। यदि आपके बच्‍चे ने पिछले 24 घंटों के दौरान काफी कम मात्रा में पेशाब किया है, उदाहरण के लिए, पहले सप्‍ताह के अंत तक छोटे शिशुओं ने 6 से कम नैपी भिगोई हैं, तो उसमें जल की कमी होने का ख़तरा है। ऐसी स्थिति में आपको अपने बच्‍चे को डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए।

पेट फूलना -

कई बच्‍चों का पेट थोड़ा-बहुत फूला रहता है, विशेषकर अधिक खाना खाने के बाद, लेकिन यह दो आहारों के बीच मुलायम महसूस होना चाहिए, विशेषकर जब बच्‍चा सो रहा हो। यदि उसका पेट निरंतर फूला हुआ और कठोर महसूस हो रहा है और साथ ही उसने एक दिन अथवा अधिक समय से मलत्‍याग नहीं किया अथवा पेट की गैस नहीं निकली है अथवा वह बार-बार उल्‍टी कर रहा है, तो आपको उसे तत्‍काल डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए, क्‍योंकि यह आंतों से संबंधित गंभीर समस्‍या हो सकती है।

बुखार-

जब कभी भी आपका बच्‍चा असामान्‍य तौर पर चिड़चिड़ा अथवा गर्म महसूस हो, तो उसका तापमान मापें। कांख का तापमान मापना ज्‍यादा सुरक्षित विकल्‍प है और 3 माह से कम आयु के बच्‍चों के लिए ऐसा करने की विशेष सलाह दी जाती है। यदि कांख का तापमान 37.3℃ / 99.1℉ से अधिक है अथवा कान का तापमान 100.4℉ से अधिक है, तो आपको उसे डॉक्‍टर के पास ले जाना चाहिए, क्‍योंकि यह संक्रमण का लक्षण हो सकता है। जल्‍दी चिकित्‍सीय सहायता मुहैया करना आवश्‍यक है, क्‍योंकि छोटे बच्‍चों की स्थिति बहुत जल्‍दी ख़राब हो सकती है।

निम्‍नलिखित स्थिति में अपने बच्‍चे को तत्‍काल डॉक्टर के पास लेकर जाएं-

पीला, उनींदा दिखाई देने पर और गर्म महसूस होने परसुस्‍त होने पर अथवा बहुत अधिक रोने परहरी अथवा रक्‍तयुक्‍त तरल की उल्‍टी करने परबिल्‍कुल आहार न लेने पर
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3. बच्चों में वायरल इनफेक्शन की समस्या


** बच्चों में वायरल इनफेक्शन की  समस्या **


गैलरी फोटो 
वायरल इनफेक्शन क्या है?
मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे बच्चे को वायरल बुखार है?
मैं अपने बच्चे को वायरल बुखार से कैसे बचा सकती हूं?
मैं अपने शिशु को स्वस्थ होने मे कैसे मदद  कर सकती हूं?अगर शिशु को वायरल बुखार है, तो कौन से गंभीर संकेतों पर मुझे ध्यान देना चाहिए?
विषाणुजनित संक्रमण और जीवाणुजनित संक्रमण में क्या अंतर है?

वायरल इनफेक्शन क्या है?

वायरल इनफेक्शन यानि विषाणुजनित संक्रमण विषाणुओं (वायरस) की वजह से होते हैं।

वहीं, जीवाणुजनित संक्रमण यानि बैक्टीरियल इनफेक्शन का कारण जीवाणु (बैक्टीरिया) होते हैं और ऐसे संक्रमणों का उपचार एंटीबायटिक दवाओं से किए जाने की जरुरत होती है।

सबसे आम वायरल बुखार मौसमी फ्लू या इनफ्लूएंजा होता है। मगर बच्चे आसानी से हल्के वायरल इनफेक्शन की चपेट में भी आ सकते हैं।

बहुत से अलग-अलग तरह के विषाणु हैं, जो आपके शिशु को बीमार बना सकते हैं। ये संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलते हैं। ये विषाणु शारीरिक संपर्क से भी फैल सकते हैं, जैसे कि विषाणु संक्रमित हाथों के जरिये।

जब वायरल संक्रमण काफी आम होते हैं, जैसे कि मौसमी बदलाव के दिनों में, तो उस दौरान ये विषाणु वायु संचार प्रणाली (एयर वेंटिलेशन सिस्टम) के जरिये भी फैल सकते हैं।

बच्चों में वायरल बुखार के लक्षण दिखने के बाद 10 दिनों तक यह संक्रमण काफी संक्रामक हो सकता है। हालांकि, कुछ लक्षण दो हफ्तों तक भी जारी रह सकते हैं। दो साल से कम उम्र के बच्चों में वायरल बुखार से जुड़ी जटिलताएं पैदा होने का खतरा ज्यादा रहता है। 

वायरल बुखार कई तरह के होते हैं। यदि शिशु को वायरल फ्लू (इनफ्लूएंजा) होता है, तो इसका उपचार न कराने पर यह निमोनिया जैसी जटिलताओं का कारण बन सकता है।

वायरल बुखारों या वायरल फ्लू के उपचार में सिर्फ बुखार, खांसी और जुकाम के लक्षणों को नियंत्रित करना होता है। ऐसी कोई दवा नहीं है, जो वायरल संक्रमण को ठीक कर सके। मगर, लक्षणों के अनुसार यह उपचार आपके शिशु को राहत देने में मदद कर सकता है। शिशु को अगर फ्लू (इनफ्लूएंजा) है, तो यह उपचार इसे आगे किसी जटिलता में तब्दील होने से रोकता है।

मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे बच्चे को वायरल बुखार है?

आमतौर पर वायरल बुखार का पहला लक्षण ठंड लगना होता है। 100 से 103 डिग्री फेरन्हाइट बुखारहोना ए​क अन्य शुरुआती लक्षण है। वायरल बुखार से संक्रमित बच्चे को अक्सर पूरे शरीर में दर्द होता है, खासकर कि पीठ और टांगों में। वायरल संक्रमण अलग-अलग प्रकार के होते हैं और लक्षण भी शायद इस बात पर निर्भर करेंगे कि आपके शिशु को कौन से विषाणु से संक्रमण हुआ है। उसे निम्नांकित में से कोई एक या इससे ज्यादा लक्षण भी हो सकते हैं:
खांसीजुकामगले में दर्दनाक बहना या नाक बंद होनासिरदर्दठंठ लगना या ठिठुरन होनाथकानमिचलीउल्टीदस्त (डायरिया)पेट में दर्द

मैं अपने बच्चे को वायरल बुखार से कैसे बचा सकती हूं?

अगर आपके बच्चे की उम्र छह महीने से लेकर दो साल के बीच है, तो आप उसे फ्लू के खिलाफ प्रतिरक्षा के लिए सालाना टीका लगवा सकती हैं। इस बारे में अपने डॉक्टर से पूछें। यह टीका शिशु को कुछ सबसे आम विषाणुओं के खिलाफ प्रतिरक्षित करेगा और किसी भी जटिलता को होने से रोकेगा 
यह बात ध्यान रखें कि फ्लू के टीके में केवल दो या तीन तरह के विषाणु ही होते हैं। इसलिए यह आपके शिशु को केवल इन्हीं दो या तीन विषाणुओं से सुरक्षित करता है। आपके शिशु को अब भी किसी दूसरे विषाणु से वायरल फ्लू हो सकता है।

बहरहाल, यह टीका हर साल बनाया जाता है, ताकि यह उस साल फैल रहे सबसे आम विषाणुओं के खिलाफ शिशु को प्रति​रक्षित कर सके। इसीलिए यह एक ऐसा टीका है, जिसे हर साल लगवाने की जरुरत होती है।

आप निम्नांकित बातें ध्यान में रखें:

अपने बच्चे को बीमार व्यक्ति से दूर रखने का प्रयास करें। सभी को खांसते या छींकते समय टिशू के इस्तेमाल के लिए कहें। इससे रोगाणुओं को फैलने से रोका जा सकता है। अगर, परिवार के किसी सदस्य या फिर कामवाली को दस्त (डायरिया) या उल्टी है, तो सुनिश्चित करें कि वे साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दें।अपने और बच्चे के हाथ अक्सर साबुन से धोती रहें, ताकि विषाणु की चपेट में आने से बचें।मौसम में बदलाव के दौरान वायरल संक्रमण सबसे आम होते हैं, इसलिए साल के ऐसे समय विशेष ध्यान रखें।

मैं अपने शिशु को स्वस्थ होने मे कैसे मदद  कर सकती हूं?

पर्याप्त पेय पदार्थ दें-
बुखार, दस्त, उल्टी या सर्दी-जुकाम के दौरान बच्चे में पानी की कमी हो जाती है। अगर आप अभी भी शिशु को स्तनपान कराती हैं, तो उसे अपनी मर्जी के अनुसार स्तनपान करने दें। आप क्लिनिक या अस्पताल से ओआरएस (ओरल रीहाइड्रेशन साल्ट्स) का घोल भी ला सकती हैं। यह आपके बच्चे को वे सभी पोषक तत्व प्रदान करेगा, जो उसने संक्रमण के दौरान खोए हैं। अगर, आपका शिशु केवल स्तनपान ही करता है, तो भी आप उसे ओआरएस का घोल दे सकती हैं।


विशेष भोजन
अगर आपके शिशु की उम्र छह महीने से ज्यादा है, तो उसे मुलायम, पतले भोजन जैसे की सूप, दाल और चीनी मिला दही दें। जैसे-जैसे शिशु थोड़ा ठीक होने लगे, तो उसे गाढ़े भोजन जैसे कि मसली हुई सब्जियां, खिचड़ी या दलिया देना शुरु कर सकती हैं। यहां और अधिक पढ़ें कि खांसी और बुखार से पीड़ित बच्चे को कैसा भोजन दिया जाए।

दवाई
अपने बच्चे को क्लिनिक या अस्पताल ले जाएं। डॉक्टर आपको जिंक टैब्लेट और यदि शिशु को दस्त हैं, तो ओआरएस दे सकते हैं। शिशु का बुखार कम करने के लिए वे आपको विशेष दर्द निवारक दवा भी दे सकते हैं।

घर में आराम
बच्चे को घर में एक अलग कमरे में शांति से आराम करने दें। संक्रमण के दौरान और इसके खत्म होने के कम से कम एक हफ्ते बाद तक उसे पूरा आराम करना चाहिए। यह उसे बीमारी से लड़ने और ठीक होने मे मदद करेगा। इससे वह परिवार के अन्य सदस्यों या बच्चों को संक्रमित करने से भी बचेगा।

बुखार कम करने का प्रयास करें
अगर आपके बच्चे को तेज बुखार है, तो आप हल्के गर्म पानी से उसका शरीर पौंछ सकती हैं। यह उसे तरोताजा बनाएगा और तापमान कम करने में भी मदद करेगा। बुखार कम करने के कुछ गैर चिकित्सकीय उपायों के बारे में यहां पढ़ें।

अपने हाथ धोएं
बच्चे को छूने से पहले और बाद में आप अपने हाथ अवश्य धोएं। इस तरह संक्रमण परिवार के अन्य सदस्यों तक फैलने से रोका जा सकता है।

उपचार
यदि आपके शिशु की तबियत अभी भी ठीक न लगे, तो डॉक्टर के पास जाएं। उनसे पूछें कि क्या कोई एंटीवायरल दवाई शिशु को दी जा सकती है।

घर की हवा बाहर निकलने दें
दिन में कम से कम एक बार खिड़कियां व दरवाजें खोलें, ताकि ताजी हवा अंदर आ सके। इससे हवा में फैले रोगाणुओं को हटाने में मदद मिलती है। अपने घर को हवादार, सूखा और साफ रखने से फफूंदी के संक्रमण को भी रोका जा सकता है। यहां पढ़ें कि अपने घर को फफूंदी मुक्त रखने के लिए आप क्या कर सकती हैं।

अगर शिशु को वायरल बुखार है, तो कौन से गंभीर संकेतों पर मुझे ध्यान देना चाहिए?

वायरल बुखार आमतौर पर गंभीर नहीं होता है, और सही उपचार से ठीक हो जाना चाहिए। मगर, यदि आपके शिशु में निम्नांकित कोई भी लक्षण दिखें, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं:
तीन हफ्तों से ज्यादा खांसीदो हफ्तों से ज्यादा दस्तमल में खून आनाएक हफ्ते या इससे ज्यादा देर बुखारदौरे पड़नाकुछ भी खाने-पीने से इंकारलगातार उल्टीसांस लेने में तकलीफअसामान्य उनींदापनदोनों पैरों में सूजन

विषाणुजनित संक्रमण और जीवाणुजनित संक्रमण में क्या अंतर है?

विषाणुजनित (वायरल) और जीवाणुजनित (बैक्टीरियल) दोनों ही संक्रमणों की वजह से बुखार, ठंड लगना और बेचैनी रहती है। इन दोनों में अंतर बताना मुश्किल हो सकता है। 

जीवाणुजनित संक्रमण में शरीर के किसी एक हिस्से में लाली, ताप, सूजन और दर्द रहता है। इसलिए, यदि आपके शिशु को जीवाणु की वजह से गले में दर्द है, तो उसे गले के एक हिस्से में ज्यादा दर्द होगा। जीवाणुजनित संक्रमण का उपचार सामान्यत: एक विशेष एंटीबायटिक से किया जाता है, जो केवल बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु को मारता है।

वहीं दूसरी तरफ, विषाणुजनित संक्रमण में एक ही समय में शरीर के विभिन्न हिस्से चपेट में आते हैं। इसलिए, अगर आपके बच्चे को यह संक्रमण है, तो उसे खांसी, नाक बहना और शरीर में दर्द एक साथ हो सकता है।

विषाणुजनित संक्रमण जैसे कि जुकाम या फ्लू पर एंटीबायटिक्स का कोई असर नहीं होता। एंटीबायटिक्स दवाएं केवल ऐसे जीवाणुजनित संक्रमणों के लिए लें, जो अपने आप ठीक नहीं हो पा रहे हों।

विषाणुजनित संक्रमण के उपचार में सामान्यत: खूब सारा पानी और तरल पदार्थ पीना, आराम करना और दर्द निवारक व बुखार कम करने की दवा लेना शामिल है। 

अधिकांश विषाणुजनित संक्रमणों जैसे कि फ्लू, से लड़ने के लिए टीके होते हैं। वे विषाणु से जल्दी और प्रभावी तरीके से निपटने में शरीर की मदद कर सकते हैं।





Wednesday, 25 October 2017

2. माँ के दूध फायदे

* माँ के दूध फायदे  *


शिशु के लिए मां का दूध अमृत के समान होता है। मां के दूध से शिशु को पोषण के साथ-साथ रोगों से लड़ने की शक्ति भी मिलती है। पहले छह महीने तक बच्चों को केवल स्तनपान पर ही निर्भर रखना चाहिए। सुपाच्य होने के कारण मां के दूध से शिशु को किसी भी तरह की पेट की गड़बड़ी होने की आशंका नहीं होती है। मां का दूध शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक होता है। इसलिए यह आपके शिशु के जीवन के लिए जरूरी है।इतना ही नहीं स्तनपान सिर्फ आपके शिशु के लिए ही नहीं बल्कि आपके लिए भी फयदेमंद है। स्तनपान कराने वाली महिलाएं रोगमुक्त रहता है

शिशु को फायदे -

एक साल से कम उम्र के शिशु में डायरिया रोग से लड़ने की क्षमता कम होती है। मां का दूध उन्हें इस रोग से लड़ने की क्षमता देता है। मां के स्तन से पहली बार निकलने वाला दूध के साथ गाढ़ा पीले रंग का द्रव भी आता है, जिसे कोलोस्ट्रम कहते हैं, इसे शिशु को जरूर पिलाएं। इससे शिशु को संक्रमण से बचने और उसकी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलती है।मां का दूध शिशु के लिए सुपाच्य होता है। इससे बच्चों पर चर्बी नहीं चढ़ती है। स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में रक्त कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है।मां का दूध का बच्चों के दिमाग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इससे बच्चों की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है।स्तनपान कराने वाली मां और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता बहुत मजबूत होता है।मां का दूध शिशु को उसी तापमान में मिलता है, जो उसके शरीर का है। इससे शिशु का सर्दी नहीं लगती है।एक महिने से एक साल की उम्र में शिशु में SIDS (अचानक शिशु मृत्यु संलक्षण) का खतरा रहता है। मां का दूध शिशु को इससे बचाता है। जिन शिशु को टीकाकरण से ठीक पहले अथवा बाद में स्तनपान कराया जाता है, उनमें तकलीफ के कम लक्षण पाए जाते हैं।

मां को होने वाले फायदे -

स्तनपान कराने से मां को गर्भावस्था के बाद होने वाली शिकायतों से मुक्ति मिल जाती है। इससे तनाव कम होता है और प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव पर नियंत्रण पाया जा सकता है।इससे माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। इसके साथ ही स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक है।खून की कमी से होने वाले रोग एनिमिया का खतरा कम होता है।मां और शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता मजबूत होता है। बच्चा अपनी मां को जल्दी पहचानने लगता है।स्तनपान के लिए आप अधिक कैलोरी का इस्तेमाल करती हैं और यह प्राकृतिक ढंग से वजन को कम करने और मोटापे से बचने में मदद करता है।स्तनपान करानेवाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का खतरा कम होता है। स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक है।


बच्‍चों को बनाना है तंदुरुस्त, तो उन्हें खिलाएं ये चीजें -




QUICK BITES:



  • बच्‍चों की तंदरूस्‍ती के लिए खिलएं ये  फूड।
  • बच्चों को बनाएं सेहतमंद।
  • बच्चों का स्वास्थ्य है जरूरी।


बच्चे आमतैर पर खाने-पाने के मामले में काफी लापरवाह होते हैं। ये उनके पैरेंट्स की जिम्मेदारी होती है कि अपने बच्चों के आहार को लेकर वे सजग रहें। बच्चों को संपूर्ण पोषण मिलना बेहद जरूरी है। बच्चों को हर रोज विटामिन्स, मिनरल्स, फैट और प्रोटीन का संतुलित मात्रा में सेवन करना चाहिए। यह उनके शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। कई माता-पिता अपने बच्चों के वजन को लेकर काफी चिंतित पाए जाते हैं। अगर बच्चों को नियमित रूप से पर्याप्त पोषण मिले तो उनका वजन संतुलित रहता है। चलिए, जानते हैं कि बच्चों के आहार में किन चीजों को शामिल कर उनके वजन में बढ़ोत्तरी की जा सकती है।

1. घी या मक्खन

घी और मक्खन फैट से भरपूर खाद्य है। बच्चों को नियमित रूप से इसका सेवन कराना चाहिए। दाल अथवा रोटी में लगाकर इसका सेवन किया जा सकता है।

2. दाल

दालें प्रोटीन की सबसे बड़ी स्रोत हैं। दाल के पानी में भी पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। अगर आपका बच्चा कमजोर है तो उसका वजन बढ़ाने के लिए उसे नियमित रूप से दाल का पानी पीने को दें। इससे बच्चों का वजन तेजी से बढ़ता

3.मलाई वाला दूध

मलाई वाले दूध में पर्याप्त मात्रा में वसा पाया जाता है। बच्चों का वजन बढ़ाने के लिए इसका सेवन काफी फायदेमंद होता है। अगर बच्चा दूध पीने से मना करता है तो शेक या फिर चॉकलेट पाउडर मिक्स करके उसे पिलाने की कोशिश करें।

4.केला शेक

केला एनर्जी का बेहतरीन स्रोत है। कमजोर बच्चों के लिए यह बेहद फायदेमंद होता है। केले का शेक या दूध और केला बच्चे को खिलाने से उनके वजन में वृद्धि होती है।

5. शकरकंद

शकरकंद फाइबर ,पोटेशियम, विटामिन ए, बी और सी से भरपूर होता है, जो बच्चों के वजन को बढ़ाने में काफी मदद करता है। कमजोर बच्चों को इसका हलवा या फिर उबाल कर दूध में मिलाकर खिलाया जा सकता है।

6. अण्डा एवं आलू

आलू में कार्बोहाईड्रेट और अंडे में प्रोटीन काफी मात्रा में पाया जाता है। कमजोर बच्चों का वजन बढ़ाने के लिए इनका सेवन बेहद जरूरी है। बच्चों को आलू या अंडा उबाल कर खिलाने से वजन बढ़ता है।

7. हरी सब्जियां

हरी सब्जियां पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। इसके अलावा इनमें पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने की भी क्षमता होती है। बच्चों को इनका नियमित सेवन करना चाहिए। वजन बढ़ाने के अलावा भी इनके अनेक फायदे होते हैं


स्वास्थ्य के साथ ही शिशु के मुंह की सफाई 


QUICK BITES:
1. स्वास्थ्य के साथ ही शिशु की सफाई।
2. शिशु के मुंह की सफाई भी है जरूरी।
3. घर पर ही करें शिशु के मुंह की सफाई।

छोटे बच्चों की परवरिश करना वाकई बहुत कठिन काम है। क्योंकि अगर बचपन में ही उनकी परवरिश में कोई कमी रह जाए तो उसका खामियाजा जिंदगी भर भुगतना पड़ता है। नवजात शिशु की देखभाल विशेष तौर पर ज्यादा कठिन होती है। खासकर अगर इन शिशुओं के दांत निकल रहें हैं तो उनके मुंह की सफाई के लिए एक्स्ट्रा समय निकालने की जरूरत होती है। विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि दांतों के निकलने के साथ ही शिशुओं के दांतों और जीभ की सफाई शुरू कर देनी चाहिए। लेकिन शिशु का मुंह साफ करने से पहले उसे अच्छे से गोद में रखने की जरूरत है। आज हम आपको शिशु के दांत साफ करने के तरीके बता रहे हैं

कैसे करें शिशु के दांत साफ ?

अगर शिशु बहुत छोटा है तो जबरदस्ती उसके मुंह में कोलगेट ना डालें। ऐसा तब तक करें जब तक शिशु अ पनी इच्छा से पानी को मुंह से बाहर निकालने ना लगे।जब तक शिशु का दांत नहीं निकल जाता उसके मसूड़ों को साफ काटन के कपड़े से पोछ कर साफ करें। किसी कठोर चीज से मसूड़े साफ करने पर रैशेज और सूजन आने का खतरा रहता है।इस बात का खास तरह से ध्यान दें कि जैसे ही शिशु का पहला दांत निकले, बच्ची को गुनगुने पानी से ब्रश कराएं।अगर आप शिशु को अपना ही दूध पिलाती हैं और आप महसूर कर रही हैं कि शिशु आपके निप्पल को हल्का हल्का काट रहा है तो समझ लें कि शिशु के दांत जल्द ही आने वाले हैं।

मुंह साफ कैसे करें

टूथपेस्ट कई केमीकल से मिलकर बनता है जिसे शिशु का शरीर स्वीकार नहीं कर पाता है। इसलिए ध्यान रखें कि शिशु के मुंह में टूथपेस्‍ट लगी न रह जाए। इस कारण बच्‍चे का मुंह अच्‍छी तरह से साफ करें। बच्‍चे के मुंह धोने संबंधी सारी प्रक्रिया बहुत ही आराम से होनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि बच्‍चा इस प्रक्रिया से इतना घबरा जाए कि अगली बार आपको सहयोग ही न दे। इस बात के लिए भी तैयार रहें कि बच्‍चा आपकी उंगली पर काट भी सकता है।

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1. नवजात शिशु की देखभाल कैसे हो

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    नवजात शिशु की देखभाल कैसे हो -


  1. शिशुओं के 1 से 28 दिनों के बीच की देखभाल "नव प्रसव देखभाल" है।जन्‍म के समय कमज़ोर बच्चों को होती है विशेष देखभाल की जरूरत।कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली शिशु में होती है संक्रमण की अधिक संभावना। शिशु के लिए फायदेमंद है माँ का पौष्टिक भोजन लेना।
  2. "नव प्रसव देखभाल" या नवजात देखभाल शब्द नवजात शिशुओं के 1 से 28 दिनों के बीच की देखभाल के लिये इस्तेमाल होता है। जन्‍म के 1 से 28 दिनों में सभी शिशुओं को अतिरिक्‍त‍ देखभाल की जरूरत होती है और यह देखभाल ही बच्चे के संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य निर्धारित करती है। लेकिन जो बच्चे जन्‍म के समय कमज़ोर होते हैं, उन्हे विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
  3. खासकर वो बच्‍चे जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, उनको संक्रमण होने की अधिक संभावना होती है, इसलिए उन्हे शुरू के 28 दिन के दौरान अधिक से अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है।
  4. थोड़े सा ध्यान देकर 'बच्चे का जीवन बचाया जा सकता है और थोड़ी सी लापरवाही भी नवजात शिशु के लिए घातक हो सकती है. नवजात देखभाल समय से पहले जन्मे बच्चे, कम वजन के बच्चे या जो बच्चे अपने नियत तारीख से पहले पैदा होते हैं दी जाती है। 
  5. अगर बच्चा कमजोर है या उसकी चिकित्‍सा चल रही है, तो उसे सुरक्षा के लिए नवजात देखभाल में रखा जाता है। मूल रूप से बच्चे के स्वास्थ्य और आवश्यकताओं के अनुसार अस्पताल के विभागो को कुछ श्रेणियों में बांटा जाता है।
  6. श्वास लेने में समस्या, अविकसित, कम वजन का, प्रतिरक्षा प्रणाली विकार जैसी समस्या के साथ पैदा हुए शिशुओं को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। इसको गहन देखभाल भी कहा जाता है। बच्चे के स्वास्थ्य की स्थिति पर नव प्रसव देखभाल कुछ दिनो से कुछ हफ्तों तक रहना निर्भर कर सकता हैं। 
  7. जिन बच्चों को इन्क्युबेटर मशीन पर रखा जाता है, उनको विशेष देखभाल की जरूरत है और उनको रोगाणुहीन दस्ताने पहने बिना स्पर्श की अनुमति नहीं होती. क्योकि उनमें संक्रमण की अधिक संभावना होती है। नवजात देखभाल के कुछ चरणों में मां को अपने बच्चे को स्तनपान कराने की अनुमती दी जाती है। नर्स को भी नवजात देखभाल के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। यह बच्चे को किसी भी संक्रमण से पूर्ण रुप से सुरक्षित रखने की प्रक्रिया है ।

 नवजात देखभाल महत्वपूर्ण क्यों है?


सभी नवजात शिशुओं को विशेष देखभाल की जरूरत है, चाहे वह स्वस्थ हो या अस्वस्थ। हर मां को अपने बच्चे को स्तनपान ज़रूर कराना चाहिये क्योकि एक नवजात शिशु के लिए यह पोषक तत्वों का सबसे अच्‍छा स्रोत है, जो बच्चे के विकास में मदद करता है।




 नवजात देखभाल का यह पहला पहलू है। यह बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए और भविष्य में सभी संक्रमणों से लड़ने में सहायक होता है। स्तनपान के विभिन्न फायदे हैं। वो माताओं जो पहले से ही किसी बीमारी से पीड़ित है मानती है और यह मानती हैं कि उन्‍हें अपने बच्चे को स्तनपान नही कराना चाहिये, यह एक पूरी तरह से गलत अवधारणा है।

कुछ मामलों में, माता-पिता को नव प्रसव देखभाल के दौरान कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन यह बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। एक शिशु के माँ और पिता को अपने नवजात देखभाल से संबंधित सभी संदेह स्पष्ट करने चाहिए।

नवजात देखभाल के दौरान एक माँ को भी पौष्टिक भोजन लेने की सलाह दी जाती है, जो बच्चे के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। नवजात देखभाल में एक माँ को बच्चे की आवश्यकता पर ध्यान देना पडेगा। साथ ही एक माँ को ये भी पता होना चाहिये कि किन परिस्थितियों में उसको तुरंत एक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से संपर्क करना चाहिए।

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