Sunday, 5 November 2017

11. सर्दी के मौसम में बच्चों को सर्दी खासी होने का डर रहता है ।

बच्चो को इंफेक्‍शन का डर

बच्चे सबसे ज्यादा इंफेक्शन की चपेट में आते हैं, खासकर सर्दी और खासी बच्चों में होने वाला एक आम समस्या है। हालाँकि, नवजात शिशु में इस तरह की समस्या कई कारणों से हो सकती है, जैसे कि माँ को यदि जुकाम हुआ हो तो बच्चे का होना लाज़िमी है। क्योंकि, बच्चे अपने माँ के दूध से ही यह इंफेक्शन अपने अंदर लेते हैं। या फिर जुकाम से पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आने से भी बच्चे इंफेक्शन की चपेट में आ जाते हैं।

हालाँकि, आप अपने छोटे बच्चे में कुछ घरेलू उपचार के जरिए इसे कम कर सकती हैं, ताकि उन्हें साँस लेने में आसानी हो सके, जो निम्न हैं-

तरल पदार्थ

अपने बच्चे को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ पीने के लिए दें क्योंकि इससे डिहाइड्रेशन से बचा जा सकता है। अक्सर, जुकाम के समय शरीर में पानी की कमी हो जाती है। साथ ही यह बच्चे की नाक में जमे श्लेम को भी बाहर निकालता है और उसे पतला करता है। लेकिन, इस बात का जरूर ध्यान रखें कि यदि आपका बच्चा 6 महीने का है तो उसे तरल पदार्थ न दें।

गुनगुने तेल की मालिश

अपने बच्चे को गुनगुने सरसो के तेल से मालिश करें, इससे न केवल बच्चे को आराम मिलेगा बल्कि जुकाम से भी राहत मिलेगी। यदि आप चाहें तो इसमें एक जायफल डाल सकती हैं, क्योंकि जायफल गर्म होता है, और बच्चे के मालिश के लिए फायदेमंद माना जाता है।

शहद

अपने बच्चे को शहद चटाएं, क्योंकि यह गले को तर करता है और राहत पहुंचाता है। साथ यह खांसी को काबू करने में भी मददगार होता है। लेकिन, इस बात का भी ध्यान रखें कि आप एक साल से कम उम्र के बच्चे को शहद न दें।

गुनगुने पानी से स्नान

अपने बच्चे को गुनगुने पानी से नहलाएं, लेकिन याद रखें कि बच्चे को नहलाते समय कमरे बंद हों। साथ ही उसे तुरंत सूखे तौलिए में लपेटे, ताकि बाहर की सर्द हवा न लग पाए।

सिर को ऊंचा करके लिटाना

सिर ऊंचा करके सुलाने से शिशु को सांस लेने में ज्यादा आसानी रहती है। आप शिशु के गद्दे के नीचे तौलिये या तकिये लगाकर सिराहना ऊँचा कर सकती हैं।

जब परेशान हो सर्दी से

सर्दी-खासी बच्चे की आम बीमारी है। यदि आप सर्दी-खासी होने पर लापरवाही बरतते हैं तो आगे चलकर यह बीमारी भयावह रूप ले लेती है। जानते हैं इस बीमारी के लक्षण व उपचार -

सर्दी-जुकाम :
सर्दी-जुकाम के जाने-पहचाने लक्षण गले में खराश और बहती नाक एक ऐसे वायरस के कारण पैदा होते हैं, जिस पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं पड़ता, इसलिए जब तक स्वयं शरीर का प्रतिरक्षा-तंत्र (डिपेंस मैकेनिज्म) उस वायरस का मुकाबला करने के योग्य नहीं बन जाता, तब तक दवाएँ उसका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं।

ऐसे में क्या करें? :
छोटे शिशुओं को सर्दी-जुकाम से ज्यादा परेशानी वास्तव में नाक बन्द होने से होती है, क्योंकि ऐसे में दूध पीते समय या सोते समय सांस लेना मुश्किल हो जाता है, इसलिए अपने डॉक्टर से शिशु की बंद नाक को खुलवाने का तरीका जान लें, ताकि आपका शिशु कम से कम आसानी से सांस तो ले सके।इसके अलावा, वह माँ जो अपने बच्चे को स्तनपान कराती हैं, वह अपने खान-पान का ख्याल रखें। क्योंकि, बच्चे अपने माँ के दूध से सारी चीजें अपनी अंदर खीचतें हैं। ऐसे में, माँ को ज्यादा ठंडी चीजों को खाने से बचना चाहिए, जैसे कि दही, अमरूद, आइसक्रीम जैसी चीजों को।

Thursday, 2 November 2017

10. बच्चों को सर्दी खासी और जुकाम से बचने के उपाय


 बच्चों की सर्दी-खांसी जड़ से ख़त्म करेंगें ये घरेलू उपाय


प्रत्येक वर्ष सैकड़ों नवजात एवं छोटे बच्चे, विशेषतः कमजोर प्रतिरक्षा-तन्त्र की कमजोरी के कारण, सर्दी-खांसी का शिकार होते हैं । वस्तुतः अधिकतर शिशु, अपने जीवन के प्रथम वर्ष में ही लगभग सात-बार इस समस्या से दो-चार होते हैं

बच्चे संक्रमित वायु, सतह या किसी संक्रमित व्यक्ति की समीपता के कारण, विभिन्न प्रकार के संक्रमण फैलाने वाले रोगाणुओं के संपर्क में आ जाते हैं। बीमार बच्चे की देखरेख, माँ-बाप एवं उनकी देखभाल करने वालों के लिए समान रूप से मुश्किल हो सकती है ।

अमेरिकन बाल-रोग अकादमी, छः वर्ष से कम आयु के बच्चों को सर्दी-खांसी की दवाईयां ना देने की सलाह देती है । क्योंकि, इन दवाईयों से घातक दुष्परिणामों की सम्भावना होती है । इन विपरीत परिस्तिथियों में प्राकृतिक तरीकों से ही उपचार करना श्रेष्ठ है । घरेलू उपचार बच्चों की सर्दी-खांसी में राहत पहुंचा कर उनके प्रतिरक्षा-तंत्र को शक्तिशाली बनाते हैं ।

फिर भी, अगर आपका शिशु तीन-माह से कम आयु का है और ज्वर से ग्रसित है तो सदैव अपने चिकित्सक से परामर्श लें। बच्चों की सर्दी-खांसी में कारगर नौ शीर्ष उपचार:


छोटे बच्चों का बुखार कम करने एवं शरीर के तापमान को विनियमित करने हेतु,
उन्हें दिन में दो से तीन बार ठन्डे पानी से अथवा स्पंज-स्नान करवाएं ।
स्पंज को कमरे के तापमान के बराबर-तापमान वाले पानी में भिगोकर उसका अतिरिक्त पानी निचोड़ लें ।
और फिर बच्चे के तापमान को कम करने के लिए उसके हाथ-पैर, कांख एवं उसके कमर से नीचे के हिस्से को पोंछे ।
 एक अन्य विकल्प के तहत आप बच्चे के माथे पर गीली पट्टियां भी रख सकते हैं । गीली पट्टियों को कुछ-एक मिनटों के अंतराल पर बदलते रहें ।

नोट: अत्यधिक ठन्डे पानी का इस्तेमाल ना करें यह शरीर के आंतरिक तापमान में बढ़ोतरी कर सकता है ।


एक कढाई में चार-नींबू का रस, उनके छिलके और एक चम्मच अदरक की फांके लें । इसमें पानी डालें ताकि सारे के सारे अवयव इसमें डूब जाएँ। इसे ढक कर 10 मिनट तक काढें । इस प्रकार तैयार पानी को अलग कर लें। अब इस तरल पेय में उतनी ही मात्र में गर्म-पानी तथा स्वाद के लिए शहद मिलाएं। बच्चे को इस प्रकार तैयार गर्म नींबू-पानी दिन में कुछ-बार पीने को दें।

नोट: एक-वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए चीनी के स्थान पर शहद मिलाएं ।


एक-वर्ष या फिर उससे कम आयु के बच्चों के लिए, जोकि सर्दी-खांसी से पीड़ित हों, शहद एक सुरक्षित उपचार है । दो चम्मच कच्चा शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिला लें । हर, कुछ एक घंटों के अंतराल के बाद राहत दिलाने के लिए पिलायें । एक गिलास गर्म-दूध, शहद मिलाकर पीने से सूखी खांसी एवं सीने के दर्द में राहत मिलती है ।

एक वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए गर्म चिकन का सूप भी एक अच्छा विकल्प है । यह हल्का एवं पोषक होता है, तथा छाती जमने और नाक बंद होने से छुटकारा दिलाता है । इसमें उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट ठीक होने की प्रक्रिया को अधिक तेज कर देते हैं । आप बच्चों को दिन में दो से तीन बार यह सूप दे सकते हैं ।


संतरे में मौजूद विटामिन-सी श्वेत रक्त कोशिकाओं का निर्माण बढाने में सहायक है । यही कोशिकाएं सर्दी-जुकाम के रोगाणुओं से लडती है । संतरा प्रतिरक्षा-तंत्र को दृढ़ता प्रदान करके खासी, गले की दर्द और नाक बहने की समस्या में राहत पहुंचाता है। दो वर्ष से कम उम्र के बच्चे को प्रतिदिन एक से दो गिलास संतरे का रस पिलायें। इससे कम आयु के बच्चों को बराबर मात्रा में पानी मिलाकर नियमित अंतराल के बाद पिलायें। बड़े बच्चों को, विटामिन-सी की ख़ुराक अधिक करने के लिए, संतरे खाने को दिए जा सकते हैं।


छः कप पानी में, आधा कप बारीक कटे हुए अदरक की फांके और दालचीनी के दो छोटे टुकड़ों को 20 मिनट तक धीमी आंच पर पकायें । फिर इसे छानकर चीनी या शहद मिलाकर दिन में कई बार बच्चे को पीने के लिए दें । एक वर्ष से कम आयु के बच्चों को बराबर मात्रा में गर्म-पानी मिलाकर पिलायें

एक हिस्सा कच्चा, बिना छाना हुआ सेब का सिरका और दो हिस्से ठंडा पानी मिलाकर उसमें दो पट्टियां भिगोयें । फिर उन्हें निचोड़कर एक को माथे पर और एक को पेट पर रखें । दस- दस मिनट के बाद पट्टियां बदलते रहें । प्रक्रिया को बुखार कम होने तक दोहरायें ।


स्तनपान बच्चों के लिए अति महत्वपूर्ण है, खासकर जब वे बीमार हों । यह उन्हें अदभुत संतुलित पोषक-तत्वों की श्रृंखला प्रदान करता है । जोकि उन्हें संक्रमण से लड़ने और शीघ्र स्वस्थ होने में सहायता करते हैं । छः माह से कम आयु के शिशुओं को, सर्दी-खांसी से निजात दिलवाने के लिए, स्तनपान कराना चाहिए ।


सुनिश्चित करें की आपके बच्चे को भरपूर तरल-पदार्थ मिलें । अन्यथा वह निर्जलीकरण का शिकार हो सकता है, जिससे समस्या अधिक गंभीर हो सकती है । शरीर में पानी का उचित स्तर, मल -निकास को पतला करके आपके बच्चे के शरीर से कीटाणुओं का निकास करने में और बंद-नाक,छाती जमने आदि की समस्या से बचाता है

 बच्चों को सर्दी  और जुकाम से बचाब

अपने शिशु को पहली बार सर्दी-जुकाम से परेशान होते हुए देखना आपके लिए भी तकलीफ भरा हो सकता है। शिशु को बेचैनी सी रहेगी और वह नाक सुड़कता रहेगा। उसे स्तनपान करने में भी मुश्किल हो सकती है। मगर, आप उसकी ये तकलीफ दूर करने के लिए काफी कुछ कर सकती हैं।

आप फिक्र न करें, इसे आमतौर पर साधारण सर्दी-जुकाम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह काफी आम है और सामान्यत: यह ज्यादा गंभीर बीमारी नहीं होती है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि आपके शिशु को पहले दो सालों में आठ से 10 बार सर्दी-जुकाम होगा। इसका मतलब है कि आपकी बहुत सी रातें जुकाम से परेशान शिशु की देखभाल में गुजरेंगी

सर्दी-जुकाम किस वजह से होता है?

सर्दी-जुकाम मुंह, नाक और गले का इनफेक्शन है, जो कि बहुत से अलग-अलग विषाणुओं में से किसी एक की वजह से होता है। शिशुओं को जुकाम ज्यादा इसलिए होता है, क्योंकि उनकी प्रतिरक्षण प्रणाली (इम्यून सिस्टम) अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती। वह अभी संक्रमणों से लड़ने की शक्ति विकसित कर रही होती है।

जब सर्दी-जुकाम से ग्रस्त कोई व्यक्ति छींकता या खांसता है, तो जुकाम के विषाणु हवा में फैल जाते हैं और किसी अन्य व्यक्ति में सांस के जरिये अंदर पहुंच जाते हैं। इसी तरीके से जुकाम एक से दूसरे व्यक्ति तक फैलता है। ये विषाणु हाथ से हाथ के संपर्क से भी फैलते हैं। इसलिए नाक छिनकने के बाद हमेशा अपने हाथ धोएं।

जुकाम शिशु को किस तरह प्रभावित करता है?

अगर आपके शिशु को जुकाम है, तो आपको निम्नांकित लक्षणों में से कुछ दिखाई दे सकते हैं:
101 डिग्री फेरनहाइट तक बुखारखांसीआंखे लाल हो जानागले में खराशकान में दर्दश्लेम (म्यूकस) से भरी और बहती नाकचिड़चिड़ापन और बेचैनीभूख न लगनालसीका पर्व (लिम्फ नोड्स) में सूजन (बगल में, गर्दन पर और सिर के पीछे)
अगर, शिशु की नाक में श्लेम भरा हो, तो उसे नाक से सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। ऐसे में शायद उसे स्तनपान करवाना भी मुश्किल हो। आमतौर पर बच्चे करीब चार साल की उम्र से पहले अपनी नाक छिनकना नहीं जान पाते, इसलिए आपको नाक से श्लेम निकालने में शिशु की मदद करनी होगी।

हो सकता है आपका शिशु अब बिना जगे पूरी रात सोने लग गया हो। ऐसे में जुकाम के दिनों में बेचैनी के कारण उसका रात में बार-बार उठना, आपको उसके जन्म के पहले कुछ हफ्तों की याद ताजा करा देगा!

सर्दी-जुकाम से बेचैनी और सांस लेने में तकलीफ की वजह से रात में वह शायद बहुत बार उठेगा। तैयार रहें, आपको भी रात को शिशु को आराम दिलाने और उसकी नाक पौंछने के लिए जागना होगा।

सामान्यत: सर्दी-जुकाम कितने समय तक रहता है?

जुकाम के लक्षण आमतौर पर तीन से 10 दिनों बाद कम होने लगते हैं, हालांकि बहुत छोटे शिशुओं में ये दो हफ्ते तक जारी रह सकते हैं। जो शिशु, बड़े बच्चों के संपर्क में ज्यादा रहते हैं, उन्हें अपने पहले साल में करीब छह से 10 बार जुकाम होता है। हो सकता है आपको उनकी नाक सर्दी के मौसम में हर समय बहती ही नजर आए।

अगर आपका बच्चा डेकेयर सेंटर या प्ले स्कूल जाता है, तो उसे एक साल में 12 बार भी सर्दी-जुकाम लग सकता है!

क्या मैं शिशु को सर्दी-जुकाम होने से बचा सकती हूं?

शिशु को स्तनपान करवाना उसके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के बेहतरीन उपायों में से एक है। इससे शिशु को आपके रोग-प्रतिकारक (एंटीबॉडीज, संक्रमण से लड़ने के लिए आपके शरीर में मौजूद रसायन) मिलते हैं। शिशु की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यह पक्का उपाय नहीं है, मगर स्तनपान करने वाले शिशु सर्दी-जुकाम और अन्य इनफेक्शन से बेहतर बचाव कर पाते हैं।

शिशु का संक्रमणों से बचाने के लिए बेहतर तो यही है कि उसे बीमार व्यक्ति से दूर रखा जाए। या फिर आप उन्हें शिशु को पकड़ने या उसकी चीजों को छूने से पहले हाथ धोने के लिए कहें।

अगर आप या आपके पति धूम्रपान करते हैं, तो इसे बंद कर देना शिशु के लिए अच्छा रहेगा। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने वाले शिशुओं को ज्यादा जुकाम होता है और यह काफी लंबा चलता है। वहीं धूम्रपान के धुएं से दूर रहने वाले शिशुओं को धुएं के संपर्क में रहने वाले शिशुओं की तुलना में कम जुकाम होता है। शिशु को ऐसी जगहों पर भी ले जाने से भी बचें, जहां कोई धूम्रपान कर रहा हो।

शिशु को सर्दी-जुकाम होने पर डॉक्टर से कब बात करनी चाहिए?

अगर आपके शिशु की उम्र तीन महीने से कम है, तो बीमारी के पहले लक्षण दिखाई देने पर ही उसे डॉक्टर के पास ले जाएं, जैसे कि:
उसका जुकाम तीन दिन से ज्यादा रहेउसका बुखार 100.4 डिग्री फेरनहाइट से ज्यादा हो जाएउसे सांस लेने में परेशानी हो रही होउसकी खांसी ठीक न हो रही होवह अपने कान खुजाता रहता है और चिड़चिड़ा हो गया है - यह कान में संक्रमण का संकेत हो सकता हैउसके खांसने पर हरा, पीला या भूरा श्लेम निकल रहा है या फिर उसकी नाक से श्लेम निकल रहा है
सर्दी-जुकाम का यदि उचित इलाज न कराया जाए, तो इससे गंभीर जीवाण्विक (बैक्टिरियल) इनफेक्शन जैसे कि निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, फ्लू या कान का संक्रमण हो सकता है।

मैं सर्दी-जुकाम का उपचार कैसे कर सकती हूं?

शिशु का जुकाम अपने आप ठीक हो जाएगा। मगर, आप उसकी परेशानी को कम करने के लिए कुछ कदम उठा सकती हैं, जैसे कि:
सुनिश्चित करें कि आपके शिशु को पर्याप्त आराम मिले।

शिशु को ज्यादा बार स्तनपान या बोतल से दूध पीने के लिए प्रोत्साहित करें। अगर आपका शिशु फॉर्मूला दूध पीता है या ठोस आहार ले रहा है, तो आप उसे पानी भी दे सकती हैं। आप विटामिन सी से भरपूर फलों के रस भी ज्यादा मात्रा में दे सकती हैं। ये सब उसे जलनियोजित रखेंगे और यदि बुखार हो, तो उसे भी कम करते हैं।

अगर शिशु को बुखार हो, तो आप डॉक्टर के निर्देश पर उसे पैरासिटामोल सस्पेंशन भी दे सकती हैं। मगर, यह उसे तीन महीने का या इससे बड़ा हो जाने पर ही दे सकती हैं। शिशु को कोई भी दवा देने से पहले डॉक्टर से अवश्य पूछ लें। सर्दी-जुकाम का कोई भी घरेलू उपचार डॉक्टर से बिना पूछे न करें। डॉक्टरी पर्ची के बिना मिलने वाली सर्दी-जुकाम की दवाएं एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। हालांकि जुकाम से राहत के लिए दवाइयां भी गैर औषधीय सिरप से कुछ ज्यादा असरदार नहीं पाई जातीं हैं।

अगर, आपके शिशु की नाक बंद हो, तो गद्दे के सिराहने पर नीचे एक-दो पुराने तौलिये लगाकर उसे थोड़ा ऊंचा उठा दें। तकियों से दम घुटने का खतरा हो सकता है, इसलिए शिशु का सिर ऊंचा करने के लिए तकियों का इस्तेमाल न करें।

आपका शिशु अभी अपनी नाक नहीं छिनक सकता। इसलिए आप उसकी नाक पौंछती रहें, ताकि उसे सांस लेने में आसानी हो। आप शिशु के नथुनों के बाहर थोड़ी सी पैट्रोलियम जैली भी लगा सकती है, ताकि त्वचा की संवेदनशीलता कम हो सके।

अगर शिशु को नाक में श्लेम भरा होने की वजह से स्तनपान करने में मुश्किल हो रही हो, तो आप उसके डॉक्टर से नाक में डालने वाली लवणयुक्त ड्रॉप्स (सैलाइन ड्रॉप्स) के बारे में पूछ सकती हैं। आप घर पर भी लवणयुक्त पानी तैयार कर सकती हैं। उबालकर ठंडे किए गए 30 मि.ली. पानी में चुटकी भर नमक मिलाने पर यह पानी तैयार हो जाता है। इस पानी के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं और इसे दिन में कई बार आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ माता-पिता शिशु की नाक में नमक का पानी डालने के बाद सक्शन बल्ब के इस्तेमाल से श्लेम बाहर निकाल लेते हैं।

भाप से भी शिशु की नाक में भरे श्लेम को ढीला करने में मदद मिल सकती है। मगर, शिशु को गर्म, भाप वाले पानी के ज्यादा नजदीक न लाएं, इससे उसके जलने का खतरा रहता है। भाप दिलवाने का एक सुरक्षित तरीका यह है कि उसे अपने साथ बाथरूम में ले जाएं। गर्म पानी का शावर चालू करें, दरवाजे को बंद कर लें और भापयुक्त बाथरूम में कुछ मिनटों तक बैठे रहें। इस तरीके से भाप दिलवाने के बाद शिशु के कपड़े अवश्य बदल दें।

वेपर रब लगाने से भी शिशु को सांस लेने में आसानी हो सकती है। इसे शिशु की छाती और पीठ पर लगाएं। शिशु के नथुनों पर इसे न लगाएं, क्योंकि इससे सांस लेने में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
अगर, आपके शिशु की केवल नाक बंद हो, और बाकी अन्य कोई लक्षण न हों, तो देख लें कि कहीं शिशु के नथुनों में कुछ और चीज तो नहीं फंस गई है। छोटे शिशु भी अपनी नाक में कुछ डालने में माहिर हो सकते हैं।।

सर्दी-जुकाम जीवन की सच्चाई है। शिशु की पहली जुकाम को देख लेने के बाद, आप शिशु की अगली जुकाम के लिए तैयार हो जाएंगी। आपको पता होगा कि जुकाम होने पर क्या हो सकता है।



Wednesday, 1 November 2017

9. बच्चो की नार्मल डिलेवरी कैसे होती है?

बच्चो की नार्मल डिलेवरी

क्योंकि मनुष्य एक द्विपाद और सीधी मुद्रा वाला प्राणी है, और श्रोणी के आकार के हिसाब से, स्तनधारी प्राणियों में मनुष्य का सर सबसे बड़ा होता है, महिलाओं के श्रोणी और मनुष्य के भ्रूण को इस तरह से बनाया गया है की जन्म संभव हो सके.

महिला की सीधी मुद्रा उसके पेट के अंगों का वजन उसके श्रोणी के तल पर डालती है, जो की एक बड़ी जटिल संरचना होती है और जिसे ना सिर्फ वजन सहना होता है बल्कि तीन वाहिकाओं को भी अपने अन्दर से बाहर जाने का रास्ता देना होता है: मूत्रमार्ग, योनि और मलाशय.अपेक्षाकृत बड़े सिर और कन्धों को श्रोणी की हड्डी से निकलने के लिए गतिशीलता का एक विशेष अनुक्रम अपनाना पड़ता है। इस गतिशीलता में किसी भी तरह की विफलता होने पर अधिक लम्बी और दर्दनाक प्रसव पीड़ा होती है और यहाँ तक की इस वजह से प्रसव रुक तक सकता है। गर्भाशय ग्रीवा के कोमल उतकों और जन्म नलिका में सभी परिवर्तन इन छह चरणों के सफल समापन पर निर्भर करते हैं:

भ्रूण के सिर का अनुप्रस्थ स्थिति में आ कर लगना. बच्चे का सिर श्रोणि के आर पार मुंह करता हुआ माता के कूल्हों पर लगा होता है।भ्रूण के सिर का उतरना और उसका आकुंचन होना.आंतरिक घूर्णन. भ्रूण का सिर ओकीपिटो हड्डी के आगे के हिस्से में 90 डिग्री पर घूमता है ताकि बच्चे का चेहरा माता के मलाशय की ओर हो.विस्तार के द्वारा डिलिवरी. भ्रूण का सिर जन्म नलिका के बाहर आता है। इसका सिर पीछे की ओर झुका होता है ताकि उसका माथा योनि के माध्यम से बाहर का रास्ता बनाता है।प्रत्यास्थापन. भ्रूण का सिर 45 डिग्री के कोण पर घूमता है ताकि यह कन्धों के साथ सामान्य स्थिति में आ जाए, जो अभी तक एक कोण पर टिके होते हैं।बाहरी घूर्णन. कंधे सिर की सर्पिल गति की आवृत्ति करते हैं, जो भ्रूण के सिर की अंतिम चाल में दिखता है।

जैसे जैसे भ्रूण का सिर जन्म नलिका से बाहर निकलता है, वह अस्थायी रूप से अपना आकार बदलता है (अधिक लंबा हो जाता है).भ्रूण के सिर के आकार के इस परिवर्तन को मोल्डिंग कहा जाता है और यह उन महिलाओं में साफ़ तौर पर दिखता है जिनकी पहली बार योनिमार्ग द्वारा प्रसूती हो रही होती है।

सुप्त चरण ÷ 

प्रसव का सुप्त चरण, जिसे प्रोडरमल लेबर भी कहते हैं, कई दिनों तक चल सकता है और इस चरण में जो संकुचन होते है वे ब्रेक्सटन हिक्स संकुचन जो कि गर्भावस्था के 26वें सप्ताह से प्रारम्भ होते हैं से अधिक गहन होते हैं। ग्रीवा विलोपन गर्भावस्था के अंतिम सप्ताहों के दौरान होता है और आमतौर पर सुप्त चरण के पूरा होने तक या तो समाप्त हो चुका होता है या समाप्त होने वाला होता है। ग्रीवा विलोपन या गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव से आशय है गर्भाशय ग्रीवा का पतला होना या फैलना.योनि परीक्षा के दौरान ग्रीवा विलोपन किस हद तक हुआ है यह महसूस किया जा सकता है। एक 'लंबी' गर्भाशय ग्रीवा का तात्पर्य है कि नीचे वाले हिस्से में बच्चा नहीं जा पाया है और छोटी ग्रीवा होने का अर्थ इसके विपरीत होता है। सुप्त चरण का अंत सक्रिय चरण की शुरुआत से होता है, जब गर्भाशय ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है।

पहला चरण: फैलाव

प्रसव पीड़ा सहती हुई माता की प्रगति का आकलन करने के लिए कई कारक होते हैं जिनका उपयोग दाइयां और चिकित्सक करते हैं और इन कारको को हम बिशप स्कोर से परिभाषित करते हैं। बिशप स्कोर का प्रयोग यह भविष्यवाणी करने के लिए भी किया जाता है की माता स्वयं ही स्वाभाविक रूप से दूसरे चरण (प्रसूती) में प्रवेश कर पाएगी या नहीं.

प्रसव का पहला चरण तब शुरू होता है जब विलोपित ग्रीवा 3 सेमी तक फ़ैल चुकी होती है। इस स्थिति में कुछ विभिन्नता हो सकती है क्योंकी इस स्थिति में पहुँचने से पहले भी कुछ महिलाओं में सक्रिय संकुचन की शुरुआत हो जाती है। वास्तविक प्रसव की शुरुआत तब मानते हैं जब गर्भाशय ग्रीवा धीरे धीरे फैलने लगती है। झिल्ली का टूटना, या रक्त के धब्बे का दिखना जिसे 'शो' कहते हैं वह इस चरण में अथवा इसके आसपास घटित हो भी सकता है और नहीं भी.

गर्भाशय की मांसपेशियां गर्भाशय के उपरी क्षेत्र से उस स्थान तक जहां पर गर्भाशय का निचला क्षेत्र जुड़ता है सर्पिल गति में घूमती है। विलोपन के दौरान, गर्भाशय ग्रीवा गर्भाशय के निचले हिस्से में शामिल हो जाती है। एक संकुचन के दौरान, ये मांसपेशियां सिकुडती हैं और बच्चे को निष्कासित करने के उद्देश्य से जो गतिविधि होती है उससे ऊपरी हिस्सा छोटा हो जाता है और निचला हिस्सा ऊपर को आता है। इससे ग्रीवा खिंच कर बच्चे के सर के ऊपर आ जाती है। पूरा फैलाव तब माना जाता है जब ग्रीवा का मुंह इतना चौड़ा हो जाता है की वह एक पूर्ण विकसित बच्चे का सर बाहर निकाल सके, जो की तकरीबन 10 सेमी होता है।

प्रसव काल की अवधि में अलग अलग महिलाओं में काफी अंतर पाया जाता है, परन्तु उन महिलाओं में जो पहली बार बच्चे को जन्म दे रही होती हैं, सक्रिय चरण औसतन आठ घंटे का होता है और चार घंटे का उन महिलाओं में होता है जो पहले भी जन्म दे चुकी होती हैं। पहली बार बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं में सक्रिय चरण का रुकना तब माना जाता है जब उनकी गर्भाशय ग्रीवा कम से कम दो घंटे में भी 1.2 सेमी प्रति घंटे की दर से भी नहीं फैलती है। यह परिभाषा फ्रीडमैन कर्व पर आधारित है, जो की सक्रिय प्रसव के दौरान ग्रीवा के फैलाव की आदर्श दर और भ्रूण के बाहर निकलने को ग्राफ की सहायता से मापती है।कुछ चिकित्सक "प्रसव की प्रगति में विफलता" बता कर, अनावश्यक रूप से सिजेरियन ऑपरेशन करते हैं। हालांकि, जैसा की किसी भी प्रथम रोग निदान के साथ होता है, ऐसा करने को गंभीर रूप से हतोत्साहित किया जाता है क्योंकी इसमें अतिरिक्त खर्चा होता है और घाव ठीक होने में काफी समय लगता है।


दूसरा चरण: भ्रूण निष्कासन

इस चरण का प्रारम्भ तब होता है जब गर्भाशय ग्रीवा पूरी तरह फैल जाती है और तब समाप्त होता है जब अंततः बच्चे का जन्म हो जाता है। जैसे जैसे गर्भाशय ग्रीवा पर दबाव बढ़ता है, फर्ग्यूसन रिफ्लेक्सगर्भाशय के संकुचन बढ़ा देता है ताकि दूसरा चरण आगे बढ़ सके.सामान्य दूसरे चरण की शुरुआत में, सिर पूरी तरह से श्रोणि में लग जाता है; और सिर का सबसे चौड़ा व्यास श्रोणि के किनारे से निकल चुका होता है।

आदर्श रूप में इसे सफलतापूर्वक (interspinous) इंटरस्पाइनस व्यास के नीचे आ जाना चाहिए.यह श्रोणि का सबसे संकरा हिस्सा होता है। यदि ये गतिविधियाँ पूरी हो जाती हैं तो, भ्रूण के सिर का श्रोणि चाप से बाहर निकलना और योनि के द्वार से बाहर निकलना रह जाता है। इस कार्य में माता के "नीचे धकेलने के प्रयास" या धक्का देने का प्रयास भी सहायता करते हैं। लेबिया के अलग होने पर भ्रूण का सिर दिखने लग जाता है जिसे "क्राउन" कहते हैं। इस बिंदु पर औरत को जलने का या चुभने का एहसास हो सकता है।

भ्रूण के सिर का जन्म प्रसव की चौथी प्रक्रिया के सफलतापूर्वक समाप्त होने का संकेत होता है (विस्तार द्वारा प्रसव और इसके बाद पांचवी और छठी प्रक्रिया (प्रत्यास्थापन और बाहरी घूर्णन) अपना स्थान लेती हैं।
नाभि रज्जु के साथ एक नवजात शिशु जिसकी नाभि रज्जु को अब बाँधना है।

प्रसव के दूसरे चरण में कुछ हद तक विभिन्नता हो सकती है और यह इस पर निर्भर करता है की पिछले कार्य कितनी सफलता से पूरे हुए हैं।

तीसरा चरण: नाभि रज्जु का बंद होना और गर्भनाल का निष्कासन

प्रसव के तीसरे चरण के दौरान और उसके बाद स्तनपान, नाभि रज्जु योनी में से दिखने लग जाती है।

भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से ले कर नाभि रज्जु के निकलने तक का काल प्रसव का तीसरा चरण कहलाता है।

इस अवस्था में नाभि रज्जु को बांधा जाता है और काटा जाता है, परन्तु अगर इसे बांधा ना भी जाए तो भी यह स्वाभाविक रूप से बंद हो जाती है। 2008 में हुई एक कोचरेन समीक्षा ने नाभि रज्जु को बाँधने के समय को देखा. यह पाया गया कि नाभि रज्जु को बाँधने के समय से माता की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु बच्चे की स्थिति में फर्क पड़ता है। यदि नाभि रज्जु को जन्म के 2-3 मिनट के बाद बांधा जाता है, तो शिशु को अपने जीवन के पहले महीने में हीमोग्लोबिन की बढ़ी हुई मात्रा मिलती है, परन्तु साथ ही बच्चे को पीलिया के कारण फोटोथेरेपी देने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। कभी कभी एक नवजात शिशु का जिगर माता के गर्भ में प्राप्त हुई सभी लाल कणिकाओं को तोड़ नहीं पाता, विशेषकर तब जब नाभि रज्जु बाँधने में देरी के कारण शिशु को अधिक मात्रा में रक्त मिल जाता है और ऐसी स्थिति में फोटोथेरेपी रक्त कणिकाओं को तोड़ने में सहायता करती है।

नाभि रज्जु का निष्कासन गर्भाशय की दीवार से शारीरिक रूप से टूट कर होता है। भ्रूण के निकलने के तुरंत बाद से नाभि रज्जु के निकलने तक के काल को प्रसव का तीसरा चरण कहते हैं। सामान्यतः बच्चे के जन्म के 15-30 मिनट के भीतर नाभि रज्जु बाहर निकाल दी जाती है। नाभि रज्जु निष्कासन को सक्रिय रूप से सम्भाला जा सकता है, उदाहरण के लिए इंट्रामसकुलर इंजेक्शन द्वारा ऑक्सीटोसिनदे कर नाभि रज्जु हाथ से खींच कर निकाल ली जाती है ताकि नाभि रज्जु के बाहर आने में सहायता की जा सके. इसके अतिरिक्त वैकल्पिक रूप से, यह थोडा इंतज़ार कर के भी निकाली जा सकती है, जिसमें नाभि रज्जु को बगैर किसी चिकित्सकीय सहायता के स्वतः ही बाहर आने दिया जाता है। एक कोचरेन डेटाबेस  अध्ययन के अनुसार खून का बहना और प्रसव पश्चात खून बहने के खतरे को उन महिलाओं में घटाया जा सकता है जिनके प्रसव के तीसरे चरण के लिए सक्रीय प्रबंधन क़ी व्यवस्था के गई होती है।


जब प्रसव के दौरान अथवा धक्का देने के दौरान अम्निओटिक थैली नहीं फटती है, तो बच्चा साबुत झिल्ली के साथ भी पैदा हो सकता है। इस तरह से जन्म लेने क़ी घटना को "कॉल (शीर्षावरण) में जन्म लेना" कहते हैं। कॉल हानिरहित होता है और उसकी झिल्ली आसानी से टूट जाती है और साफ़ क़ी जा सकती है। आधुनिक सुधारात्मक (interventive) प्रसूति विज्ञान के आगमन के साथ, कृत्रिम रूप से झिल्ली को तोड़ना आम हो गया है, अतः बच्चे शायद ही कभी कॉल में पैदा होते हैं।

चौथा चरण

"प्रसव का चौथा चरण" एक ऐसा शब्द है जो दो अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है:

इसका तात्पर्य प्रसव के तुरंत बाद से हो सकता है, अथवा नाभि रज्जु के निकल आने के तुरंत बाद वाले घंटों से भी हो सकता है।प्रसव के बाद के हफ़्तों के लिए भी लाक्षणिक रूप से इसका प्रयोग हो सकता है।

बच्चे के जन्म के बाद

कई संस्कृतियों में बच्चों के जीवन क़ी शुरुआत के साथ रिवाज जुड़े हुए हैं, जैसे नामकरण संस्कार, दीक्षा संस्कार और अन्य.

माताओं को अक्सर एक अवधि ऐसी मिलती है जब वे अपने सामान्य काम से मुक्त होकर बच्चे के जन्म के बाद स्वास्थ्यलाभ अर्जित करती हैं। यह अवधि भिन्न भिन्न हो सकती है। कई देशों में, नवजात शिशु क़ी देखभाल के लिए काम से छुट्टी लेने को "मातृत्व अवकाश" या "पैरंटल अवकाश" कहा जाता है और यह अलग अलग जगहों पर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों के बीच हो सकता है।

अन्तिम चरण

स्टेशन से तात्पर्य है भ्रूण के बाहर निकलने वाले भाग का इशीअल स्पाइन से सम्बन्ध. जब बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग इशीअल स्पाइन पर होता है तब स्टेशन शून्य माना जाता है। अगर बच्चे का बाहर निकलने वाला भाग स्पाइन के ऊपर होता है, तब इस दूरी को माइनस स्टेशंस में मापा और बताया जाता है, जो -1 से -4 सेमी के बीच हो सकता है। अगर पेश भाग इशीअल स्पाइन से नीचे होता है, तब इस दूरी को प्लस स्टेशन में बताते हैं (+1 से +4 सेमी). +3 और +4 पर बच्चे का पेश भाग मूलाधार पर होता है और देखा जा सकता है।
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